रविवार, 6 नवंबर 2011

विरुद्ध.....

(अपने दूसरे ब्लॉग " अपनी बात..." पर मैने श्री हरिशंकर परसाई जी से जुड़ा अपना संस्मरण पोस्ट किया तो उसमें वसुधा में प्रकाशित कहानी का भी ज़िक्र आया. मेरे कई मित्रों ने उस कहानी को पोस्ट करने का आग्रह किया. तो लीजिये, आप सबकी फ़रमाइश पर ..... १९८७ में लिखी और वसुधा में परसाई जी द्वारा प्रकाशित कहानी)

बहुत
दिनों के बाद आज पापा के ठहाके सुनाई दे रहे थे. दिन भर की थकान के बावजूद भाभी फिर किचन में व्यस्त दिखाई दे रही थीं.सबके चेहरों पर छाई खुशी, बस देखने लायक़ थी. और सच कहूं तो मेरा मन भी आज बेहद हल्का हो आया था.
पिछले कुछ वर्षों से पापा मेरे विवाह को लेकर इतने चिंतित और परेशान थे कि उनकी हालत देखते हुए मुझे भी लगता था कि कैसे भी , कहीं भी मेरा रिश्ता तय हो जाये, अन्यथा शादी की मेरी इच्छा तो उसी दिन मर गई थी ,जिस दिन पापा ने मुझे मांगने आये सुनील की झोली को मेरे बदले ढेर सारी लताड़ और अपमानजनक शब्दों से भरदिया था. मैं भी पीछे हट गई थी . परिपक्व अवस्था होने के कारण डर गई थी शायद पापा कोभी तरह भटकना, परेशान होना, वैवाहिक कॉलम देखना मंजूर था, लेकिन सुनील के साथ रिश्ता मंजूर नहींथा. इसके पीछेसुनील का विजातीय होना ही मुख्य कारण रहा हो शायद.

भी दस दिन पहले ही तो ताऊ जी का पत्र आया था कि शर्मा जी को उन्होंने मेरी तस्वीर और मुझसे सम्बन्धित सारी जानकारियां दे दी हैं. और वे लोग ग्यारह तारीख को मुझे देखने रहे हैं

हमेशा की तरह घर को फिर नये सिरे से व्यवस्थित किया गया.सोफ़ों पर नये कवर, कुशन, बेड शीट्स सब बदलदिये गये. नयी क्रॉकरी और स्टील के नये बर्तन, जिन्हें देख के कोई भी कह सकता था कि इनका इस्तेमाल अभी तक नहीं हुआ है, निकाले गये. घर के सभी लोग उत्साहित थे, एक मुझे छोड़ के. मैं पूरी तरह तैयार थी ये सुनने के लिये कि- " हम घर पहुंच कर पत्र लिखेंगे". पत्र का मजमून भी मुझे मालूम था. हमेशा ऐसा ही होता है. तब, जबकि मैं सुन्दर ही कही जाती हूं. शकल-सूरत ठीक-ठाक ही दी है भगवान ने.और फिर हमारे मम्मी-पापा ने क्या नहींसिखाया हम भाई-बहनों को?
संगीत में मेरी रुचि और गले को देखते हुए पापा ने बी.म्यूज़. की डिग्री दिलाई थी मुझे. एम.एससी. तो थी ही. सुरसधा रहे, इसके रियाज़ के लिये तानपूरा भी इलाहाबाद से मंगवा के दिया था उन्होंने.
नियत समय पर शर्मा जी आये और मेरी आशा के विपरीत , सगाई की औपचारिकता भी पूरी कर गये थे. बस, तभी से खुशी तो जैसे हमारे घर से छलकी-छलकी पड़ रही थी.

बहुत धूम-धाम से शादी की थी पापा ने. मैं भी ऐसा सुदर्शन पति पाकर एकबारगी सुनील को भुला बैठी थी.
सब कुछ ठीक होने के बाद भी बेहद बंधी-बंधी सी महसूस करती थी मैं. पता नहीं सबके व्यवहार में ऐसा क्या था,कि बड़ी सहमी-सहमी सी रहती थी. हर वक्त राहुल की पद-प्रतिष्ठा के मुताबिक रहना पड़ता था मुझे. इतनी बंध के तो कभी रही ही नहीं मैं.जब जो चाहा सो किया. सचमुच कभी-कभी तो लगता कि जबरन ओढी गई इस सभ्यता को उतार फेंकूं, और खूब ज़ोर से हंसू, खिलखिलाऊं. लेकिन . यहां तो सब मुस्कुराते हैं वो भी कड़वा सा.
एक साल होने को आया, लेकिन अभी तक राहुल की मित्र-मंडली एक-एक कर हमें कभी डिनर तो कभी लंच परआमंत्रित कर रही थी. इसी क्रम में आज हमें राहुल के जनरल मैनेजर कोहली साहब ने डिनर पर आमंत्रित कियाथा. बड़े जतन से तैयार हुई थी मैं. लाल सिल्क की साड़ी पहन कर तो मैं अपने आप पर ही मुग्ध हो उठी थी, सच्ची.
हमारे स्वागत में कोहली जी ने तो एक छोटी-मोटी पार्टी का ही इन्तज़ाम कर डाला था
राहुल के परिचितों के बीच बड़े भैया के सहपाठी, जो कि संगीत में भी बड़ी गहरी दखल रखते थे, को देख कर मुझे तो लगा कि मैं शशि दा को नहीं, बल्कि बड़े भैया को ही देख रही हूं। सच! खुशी के मारे मेरे तो आंसू ही गए. शशि दा हमेशा से ही मेरे गायन के प्रशंसक रहे हैंबस यहाँ भी उन्होंने अपनी पुरानी रागमाला शुरू कर दी और उपस्थित लोगों को मेरे बारे में विस्तार से जानकारियां देने लगे, बल्कि अतिश्योक्तिपूर्ण गुणगान करने लगे
" दोस्तों, आज हमारे बीच अंजलि जी मौजूद हैं, तो मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे एक गीत सुना कर हम सब को कृतार्थ करें, यदि राहुल साब को कोई आपत्ति हो, तो।"
" लो! भला राहुल को क्या आपत्ति होगी? शुरू हो जाइए भाभी जी।"
" अब तो राहुल को आपत्ति हो भी , तब भी हम आपका गाना सुनेंगे ही। "
चारों तरफ से पड़ते दवाब और इतने दिनों बाद फिर गाने की बात सुन के मेरा मन भी कुछ गाने को होने लगा था।ग़ालिब की एक सुन्दर सी ग़ज़ल सुनाई थी मैंनेहॉल तालियों कि गड़गड़ाहट से गूँज उठा थामैंने भी गर्वीली दृष्टि राहुल पर डाली, लेकिन राहुल कहीं और देख रहे थे.हाँ, उनके चहरे पर इतनी कठोरता छाई थी, कि मैं उनकी नाराजगी स्पष्ट अनुभव कर रही थीमूड ऑफ हो गया था मेराराहुल उठ के कोहली जी से विदा लेने लगे थेमुझे विदा करते लोग , एक बार फिर मुझे घेर के बधाई देने लगे थे, तभी राहुल आये थे और मेरा हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए, सबको शुभरात्रि कह बाहर चल दिए थेराहुल की इस हरकत पर मुझे बड़ा आश्चर्य और अपमान भी महसूस हुआ थाकार में राहुल के पार्श्व में बैठ कर भी मुझे लगा था , कि मैं राहुल से दूर हूँ, बहुत दूर.
घर पहुंचते ही राहुल फट पड़े थे-
" क्या ज़रुरत थी तुम्हें वहां गाने की? क्या को भी बहाना नहीं था तुम्हारे पास? उस शशि दा ने ज़रा से तुम्हारे गले की तारीफ़ क्या की, तुम तो शुरू ही हो गईं? कान खोल के सुन लो, मुझे कोठेवालियों की तरह गाने वाली लड़कियां बिलकुल पसंद नहीं
क्या! कोठेवालियों की तरह!!
मैं अवाक थी. तो क्या मेरे पापा किसी कोठे के संचालक थे, जिन्होंने मुझे विधिवत संगीत की शिक्षा दिलवाई!! जैसे-तैसे अपने आप को संयत कर पूछा था मैंने-
" इस तरह गाना तुम्हारी नज़र में कोठेवालियों की तरह गाना है?"
" जी हां. महफ़िलों में गाना मैं निकृष्टम मानता हूं. एक बात और, यदि मेरे साथ रहना है तो आपको मेरी तरह रहना होगा. और तुम्हारा वो शशि दा, उसे भी मैं अच्छी तरह जानता हूं. एक नम्बर का लफ़ंगा है. तुम्हारी तारीफ़ करके इतना गदगद क्यों हो रहा था? और जिस तरह वो तुम्हें देखे जा रहा था, क्या इस तरह कोई भी शरीफ़ आदमी किसी की पत्नी को घूरता है? क्यों कर रहा था ऐसा वो? कब से पहचान है तुम लोगों की?"
ज़मीन पर गिरी थी मैं ! इतने भव्य व्यक्तित्व के पीछे इतना बौना - ओछा इंसान!! कितनी कुत्सित सोच!!!
पूरी रात राहुल के शब्दों ने सोने नहीं दिया था. मुझे और शशि दा को लेकर राहुल कितनी बड़ी बात कह गये हैं. मैं शशि दा को बचपन से जानती हूं. ये सही है कि वे किसी की भी प्रशंसा इतने खुले दिल से करते हैं कि कोई शक्की दिमाग़ आदमी ज़रूर उसे ग़लत अर्थों में ले ले, जैसा राहुल के साथ हुआ. लेकिन क्या इतने दिनों के साथ के बाद भी राहुल मुझे नहीं समझ पाये? पति-पत्नी का सम्बंध विश्वास पर ही टिका होता है.
और जिस दिन ये विश्वास टूटता है, उसी दिन दाम्पत्य जीवन से प्रेम खत्म हो जाता है. बाक़ी की पूरी विवाहित ज़िन्दगी एक सामाजिक समझौते के तहत गुज़रती रहती है.
इस घटना के बाद से तो जैसे राहुल मुखर हो उठे थे. बात-बात पर व्यंग्य करना, शक करना. यहां तक कि यदि मैं खिड़की में खड़ी हूं, तो फ़ौरन आकर नीचे देखते कि मैं किसे देख रही हूं. बल्कि मुझसे कह ही देते थे. तिलमिला के रह जाती थी मैं. अभी तक मेरे चरित्र पर किसी ने आक्षेप नहीं किया था, और अब मेरा पति ही मुझ पर शक कर रहा है!! कैसे गुज़ारूंगी इतनी लम्बी ज़िन्दगी? ये कैसा कारावास मिला था मुझे? बिना किसी अपराध के आजीवन सज़ा??
घर में शान्ति रहे, हमारे सम्बंध सामान्य बने रहें, सिर्फ़ इसीलिये मैने मम्मी-पापा के दिए हुए अपने तानपूरे को उसी दिन से छुआ तक नहीं था, जिस दिन राहुल ने संगीत के प्रति ऐसी वितृष्णा ज़ाहिर की थी. वरना उसकी धूल तो रोज़ झाड़ ही देती थी. मैने अपना संगीत छोड़ा तुम्हारे लिये राहुल, सिर्फ़ तुम्हारे लिये और तुम मेरी हर छोटी-बड़ी हरक़त पर नज़र रखते हो? उफ़!! कितना असहनीय, मन को दुखाने वाला होता है ये साथ. पता नहीं कैसे शादी के बाद इतने दिनों तक राहुल अपने इस शक़्क़ी मिज़ाज़ को कैसे जब्त किये रहे.
आज तो हद ही हो गई. सुबह सुबह शशि दादा एक पत्रिका का नया अंक लेकर आ धमके, और फिर उसमें प्रकाशित सुगम संगीत की एक प्रतियोगिता के नियमों के बारे में विस्तार से समझाने लगे. अपनी आदत के मुताबिक वे मेरी प्रशंसा के पुल भी बांधते जा रहे थे तभी बेडरूम से राहुल अपने स्लीपिंग गाउन की बेल्ट कसते हुए बाहर आकर बड़ी तल्खी से बोले थे-
" शशि दा इस संगीत सम्बंधी जानकारी की मेरी पत्नी को तो आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. हां यदि अंजलि जी पर गायकी का नशा चढा हुआ हो, तो ज़रूर आप इन्हें किसी संगीतमय स्थान पर ले जाकर बिठा दें, ताकि ये अपने सुर-ताल का पूरा और सही उपयोग कर सकें."
शशि दा अवाक राहुल को देख रहे थे, जैसे उसके कहे शब्दों का अर्थ ढूंढ रहे हों. शर्म और अपमान से मेरा चेहरा लाल हो गया था. शशि दा भी राहुल के कटाक्ष को तो नहीं समझे, लेकिन वक्त की नज़ाकत को ज़रूर समझ गये और अपनी पत्रिका समेट चुपचाप चले गये. कितना तक़लीफ़देह! मुझे लगा कि मैं इस मानसिक रूप से बीमार आदमी के साथ कैसे और क्यों रह रही हूं? इसकी अंगुली के हर सही-ग़लत इशारे पर क्यों नाचती हूं? क्यों इसके किसी भी ग़लत आरोप का खंडन नहीं करती? ये फ़िल्म नहीं चल रही है कि तीन घंटे बाद सारी ग़लतफ़हमियां दूर हो जायेंगीं. यहां तो पूरी उम्र गुज़र जायेगी और शायद तब भी ग़लतफ़हमियां दूर न हो सकें.
मैं अभी भी विश्वास नहीं कर पा रही थी कि शशि दा के सामने राहुल ने इतना कुछ कहा है. शायद यही जांचने के लिये मैंने पूछा था-
" राहुल, क्या तुम जनते हो कि तुमने शशि दा के सामने क्या कहा है?"
" क्यों? क्या मैं तुम्हें नशे में दिखाई दे रहा हूं? एक बार फिर और शायद अन्तिम बार कह रहा हूं कि मुझे तुम्हारा ये गाना और उसके बहाने इस शशि का आना सख्त नापसंद है. यदि तुमसे ये संगीत न छोड़ा जा रहा हो तो तुम मेरी ओर से स्वतंत्र हो. मैं पहले भी कह चुका हूं कि यदि तुम्हें मेरे साथ रहना है तो मेरी तरह रहना होगा, वरना हमारे रास्ते अलग हैं ."
मेरा जवाब सुने बिना ही राहुल दरवाज़े से बाहर हो गये थे, उसकी उन्हें ज़रूरत भी कहां थी?
मैं जानती हूं राहुल कि तुम्हें क्या पसंद है. तुम्हें फ़्लोर पर डांस करती, अपने पतियों के अधिकारियों से मुस्कुरा मुस्कुरा के बात करती लड़कियां अच्छी लगती हैं. मुझे याद है शादी के बाद वाली तुम्हारे बॉस की पार्टी में मैने उनका डांस का ऑफ़र ठुकरा दिया था, जो तुम्हें नाग़वार गुज़रा था. लेकिन मुझे इस तरह की लड़कियां अच्छी नहीं लगतीं.
हो सकता है कि उन लड़कियों के सामने किसी तरह की मजबूरी रहती हो, या फिर वे ही अंधी आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने के लिये ये सब करती हों, लेकिन मेरे सामने कोई मजबूरी नही है. और न ही मैं तुम्हारे साथ रहने को मजबूर हूं राहुल. आज भी मैं अपनी मर्ज़ी से अपना रास्ता चुन सकती हूं. मुझे निर्णय ले ही लेना चाहिये.
और आज लगभग साल भर बाद एक बार फिर घर में तानपूरे के स्वर गूंज रहे थे.

58 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़िंदगी कोई फिल्म नहीं जो तीन घंटे में गलतफहमियां दूर कर दे .. पल पल लगने वाले निरर्थक लांछन मन में विद्रोह को जन्म देते हैं ... बहुत अच्छी कहानी ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

कल 08/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

sushma 'आहुति' ने कहा…

सारगर्भित पोस्ट.....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

आरम्भ से अंत तक कहानी ने पाठक को बाँध कर रखा है
सच तो यही है कि ये माहौल व्यक्ति की जीने की इच्छा छीन लेता है
पति हो या पत्नी शक का कीड़ा जिस के भी दिमाग़ में कुलबुलाया
घर बर्बाद करने के लिए काफ़ी होता है
बहुत सुन्दर कहानी !!
बड़ी कुशलता से तुम ने नायिका की मनःस्थिति का चित्रण किया है
बधाई हो एक ऐसी कहानी के लिए जो शायद हमेशा ही 'समसामयिक' रहेगी

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन के भ्रम सुलझाने में समय लगता है, कभी कभी तो सारा जीवन निकल जाता है। कहानी के माध्यम से व्यक्त प्रभावी अभिव्यक्ति।

rashmi ravija ने कहा…

कहानी के पात्रों के मध्य से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है....जाने कितनी अंजलियों के स्वर किन्ही राहुलों ने बंधक बना रखे हैं.

पत्नी की इच्छाओं पर अपना आधिपत्य समझना उनमे पलती असुरक्षा के भाव का द्योतक है...जिसे कहानी में बहुत ही कुशलता से उभारा गया है. अपनी पत्नी के हर क्रिया-कलाप पर नज़र रखना...पति की कमजोरी ही दर्शाता है.

बहुत ही सशक्त कहानी...एक अफ़सोस भी जाग रहा है मन में..इतनी बढ़िया कहानियाँ लिखनेवाली लेखिका नई कहानियों के लिए समय नहीं निकाल पा रही है..:(

Pallavi ने कहा…

संगीता आंटी की बात से पूर्णतः सहमत हूँ ....॰

shikha varshney ने कहा…

एक बहुत ही व्यावहारिक कहानी .
सच जिंदगी कोई फिल्म नहीं कि पल भर में किसी का स्वभाव या सोच बदल जाये.
अच्छा लगा अंजलि का फैसला.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

०- धन्यवाद यशवंत जी.
०- शुक्रिया इस्मत, कहानी की इतनी तारीफ़ के लिये :)
०- मैं सदके जावां रश्मि.... सच्ची निहाल कर दिया तुमने. बहुत जल्दी एक नयी कहानी लिख के तुम्हारी शिक़ायत दूर करती हूं :)
०- धन्यवाद संगीता जी, प्रवीण जी, पल्लवी जी और शिखा जी.

वाणी गीत ने कहा…

हमारे सामाजिक परिवेश की सच्ची व्यथा कहती है कहानी . अक्सर होता है ऐसा , लड़की या लड़के के जिन गुणों पर रीझ कर विवाह किया जाता है , वही विवाह के बाद खटकने लगते हैं !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

नेट पर लम्बी कहानी पढ़ना मेरे लिए कठिन काम है। कल ही पुस्तक मेला से हरिशंकर परसाई की दो पुस्तकें ले आया हूँ..वही पढ़ रहा था। संदर्भित पोस्ट भी मैने पढ़ी थी। यहां भी उनका जिक्र देखकर अनायास पढ़ने लगा तो पढ़ता ही चला गया। शुरू से अंत तक कहानी बांधे रखती है। कहानी की रोचकता और दर्द का अहसास ह्रदय को छू लेता है।
बहुत बढ़िया कहानी है। पढ़वाने के लिए आभार आपका।

Kajal Kumar ने कहा…

वाह जी बल्ले बल्ले

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

0-चर्चा मंच पर शामिल करने के लिये आभारी हूं शास्त्री जी.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

0- धन्यवाद वाणी जी.
0- धन्यवाद देवेन्द्र जी. भला हुआ, जो आप परसाई जी को पढ रहे थे, और भला किया मैने जो, परसाई जी का ज़िक्र शुरुआत में ही कर दिया, वरना आप तो पढते ही नहीं :) :)
0- शुक्रिया काजल जी.

मनोज कुमार ने कहा…

कहानी कथ्य और शिल्प दोनों मामले में बेजोड़ है। कथा बुनने का आपका कौशल सधा हुआ है।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

सुन्दर कहानी....
सादर बधाई....

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

saarthak lekh.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऐसा कई बार देखा है की शक्की साथी होने के कारण जीवन जहर बन जाता है ... अनेक बार मजबूरी कठोर कदन नहीं उठाने देती ...
कहानी के माध्यम से दृढ़ता का भाव लाने को प्रेरित करते हैं आपके पात्र ... शिल्प भी बेजोड है ...

M VERMA ने कहा…

विसंगतियों को रेखांकित करती सुन्दर कहानी

Yashwant Mehta "Yash" ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कहानी.....नायिका के भावो का सजीव वर्णन

Arvind Mishra ने कहा…

एक सहज गति से चलती ,अंतर्द्वंद्वों को उभारती अच्छी यथार्थ कथा!

सुमन'मीत' ने कहा…

yatharth ke najdik...bahut achchhi khani..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 10- 11 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ...शीर्षक विहीन पोस्ट्स ..हलचल हुई क्या ???/

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

prabhavpoorn kahani .

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर कहानी
बहुत बहुत शुभकामनाएं

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद मनोज जी, हबीब जी, सुरेन्द्र जी,नासवा जी, वर्मा जी, यशवंत जी, अरविंद जी, सुमन जी, अनुपमा जी, और महेन्द्र जी. आभारी हूं.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद संगीता जी, हलचल में दोबारा स्थान देने के लिये :)

रचना दीक्षित ने कहा…

वंदना जी क्या कहानी बुनी है आपने. आदि से अंत तक एक सांस में पढ़ गयी. ऐसे पात्रों की हमारे समाज में कोई कमी नहीं है फिर भी बार बार इस तरह का व्यबहार सोचने पर विवश कर देता है.

आपकी कहानियाँ जल्दी जल्दी आती रहें, ऐसी इच्छा जरूर हो गयी हैं. देखते है पूरी होती है कि नहीं.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कोशिश करूंगी रचना जी की आपकी इच्छा पूरी कर सकूं :) आभार.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वंदना जी, यही तो है कुछ लोगों की हक़ीक़त...
अपने लिए कुछ और नियम, तो दूसरों के लिए अलग सिद्धांत बना लेते हैं...
बहुत अच्छी कहानी प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जीवन का व्यवहारिक सच लिए कहानी .......

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर, शानदार और प्रभावपूर्ण कहानी प्रस्तुत किया है आपने! बेहद पसंद आया!

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत ही प्रभावशाली कहानी है...बहुत पसंद आई.

संजय भास्कर ने कहा…

....अच्छी कहानी प्रस्तुत करने के लिए शुक्रिया...वंदना दी

संजय भास्कर ने कहा…

आजकल कुछ निजी व्यस्तताओं के कारन ब्लॉग जगत में पर्याप्त समय नहीं दे पा रहा हूँ जिसका मुझे खेद है.....हार्दिक शुभकामनाएं !

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

एक बार शुरु करने पर पूरी पढनी पडी।

रक्षा द्विवेदी ने कहा…

ekdum sahi baat kahi aapne.is samaj me bahut sare aise log mil jayenge jinki marji ke khilaf kuch karna hamesha galat hi hota hai,isliye kabhi kisi ki betuki baton ke liye jo hamesha takleef de apni life kharab nahin karna chahiye.
AAKHIR YE LIFE BAAR-2 THODE NA MILTI HAI?

dheerendra ने कहा…

बहुत सुंदर कहानी
इसे पढवाने के लिए आभार,..बधाई
मेरे पोस्ट में स्वागत है,...

बेनामी ने कहा…

very good

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

kahani poore lay me dikh rahi hai ... ak achhi kahani ke liye sadar abhar.. mere blog pr bhi ak kahani Shnkhnad ka avlokan hetu amntran hai ..

संजय भास्कर ने कहा…

नववर्ष की आपको बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ.

शुभकामनओं के साथ
संजय भास्कर
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

dheerendra ने कहा…

एक बहुत बढ़िया प्रस्तुति,यह कहानी मैंने पढ़ी है फिर से पढवाने के लिए आभार ......
welcome to new post--जिन्दगीं--

मनीष सिंह निराला ने कहा…

bahut sundar prastuti.

Udan Tashtari ने कहा…

ab khula jaa kar...to karaar aaya. :)

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अरे वाह समीर जी...हम खुश हुए :) :)

Deepak Shukla ने कहा…

Vandana ji...

Aapka email pata dekhne aapke profile par gaye to edhar aa gaye...wah....kya kahani likhi hai... Aaj ke jamane main 80 pratishat vivahit rishton main amuman ladkiyon ko jaane kitne tyaag karne padte hain apn parivaar main samanjasya sthapit karne ke liye.. Kabhi saas-sasur ki khushi, to kabhi devar-nand, jeth-jethani, maata-pita, bhai-bhabhi aur pati...har rishta humare samaj main ladkiyon pe apni tarah ki koi na koi pabandi lagane ki koshish karta hai....bahut kam Anjalian hotin hain jo jeevan main punah Tanpure ke swar nikaal paati hain...anyatha..es nakkarkhane main tooti ki awaaj hamesha ansuni kar di jaati rahi hai...

Dampatya jeevan main aapsi samanjasy sthapit hi karne padte hain...jaruri nahi ki dono log ek hi mizaaj ke hon...par jab rishton main etni kaduwahat aa jaye ki wo bojh lagne lagen...to aise bandhanon se aaazad ho jaana hi shreyaskar hai....

Sabhi ke anurodh ke samarthan main mera vote bhi pada samajha jaaye....agli kahani ki pratiksha rahegi....

Saadar...

Deepak Shukla..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

शुक्रिया दीपक जी.

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी ..... शुक्रिया.

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कहानी.

anil ayaan Shrivastava ने कहा…

कला की पुजारिन और कला के निंदकों के बीच के मनः अंतर्विरोधों को प्रसतुत करती कहानी ह... नायिका की बदकिस्मती है की उसका विवाह उस घर में हुआ जो कला के किसी कोण से पक्षधर नहीं थे. और उसकी कला वहा पर अंतिम सांसे लेती नजर आती है.
आज के समय में भी ये कहानी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की लिखने के समय में थी.anil ayaan..satna

anil ayaan Shrivastava ने कहा…

कला की पुजारिन और कला के निंदकों के बीच के मनः अंतर्विरोधों को प्रसतुत करती कहानी ह... नायिका की बदकिस्मती है की उसका विवाह उस घर में हुआ जो कला के किसी कोण से पक्षधर नहीं थे. और उसकी कला वहा पर अंतिम सांसे लेती नजर आती है.
आज के समय में भी ये कहानी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की लिखने के समय में थी.anil ayaan..satna

anil ayaan Shrivastava ने कहा…

कला की पुजारिन और कला के निंदकों के बीच के मनः अंतर्विरोधों को प्रसतुत करती कहानी ह... नायिका की बदकिस्मती है की उसका विवाह उस घर में हुआ जो कला के किसी कोण से पक्षधर नहीं थे. और उसकी कला वहा पर अंतिम सांसे लेती नजर आती है.
आज के समय में भी ये कहानी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की लिखने के समय में थी.anil ayaan..satna

सतीश सक्सेना ने कहा…

बेहद प्रभावशाली कहानी ...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

बहुत ही सशक्त कहानी...

शोभना चौरे ने कहा…

अंजली बधाई की पात्र है ,वरना कितनी ही अन्ज्लियाँ है जो जीवन भर घुट घुट कर जीती है अपने आसपास उनके काबिलियत का दोहन होते देखा है ।
बहुत उम्दा कहानी ।

Simran ने कहा…

Namaste Vandana ji,
Maine aapki panktiyan sanjay ji ki blog par padhi. Ve mujhe behad umda lagi aur isi dhun ne mujhe aapke blog par bula liya.
Bohot hi accha anubhav kar rahi hu aapki posts ko padh kar.

Meri dher saare shubhkamnayien aapko.

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

आपके ब्लाग देखते-देखते यह कहानी भी दिखी । बहुत ही जानी-पहचानी सी कहानी पाठकों को बाँधे रखती है । यही इसकी सफलता है । एक ही विषय पर सैकड़ों कहानियाँ लिखी जातीं हैं लेकिन शिल्प उसे विशिष्ट बना देता है । आपकी कहानी भी ऐसी ही है। अच्छा लगा आपका ब्लाग देखकर ।