मंगलवार, 28 जून 2011

क्या फ़र्क पड़ता है?

सर्दियों की
गुनगुनी धूप सेंकतीं औरतें,
उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
किसी घोटाले से,
करोड़ों के घोटाले से,
या उससे भी ज़्यादा के.
गर्मियों की दोपहर में
गपियाती ,
फ़ुरसत से एड़ियां रगड़ती औरतें,
वे नहीं जानतीं
ओबामा और ओसामा के बीच का फ़र्क,
जानना भी नहीं चाहतीं.
उन्हें उत्तेजित नहीं करता
अन्ना का अनशन पर बैठना,
या लोगों का रैली निकालना.
किसी घोटाले के पर्दाफ़ाश होने
या किसी मिशन में
एक आतंकी के मारे जाने से
उन्हें क्या फ़र्क पड़ता है?
या किसी को भी क्या फ़र्क पड़ता है?
ये कि अब आतंकी नहीं होंगे?
कि अब भ्रष्टाचार नहीं होगा?
कि अब घोटाले नहीं होंगे?
इसीलिये क्या फ़र्क पड़ता है,
यदि चंद औरतें
देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!

30 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कोउ नृप होये हमें का हानी।

मनोज कुमार ने कहा…

क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सी उदासीनता से ही तो सब फ़र्क़ पड़ता है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!

मुगालते में तो सारी ज़िंदगी ही निकाल देती हैं औरतें ...
केवल स्त्रियां ही नहीं बहुत से पुरुष भी ऐसे ही जी लेते हैं ..
अच्छी प्रस्तुति

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

इसीलिये क्या फ़र्क पड़ता है,
यदि चंद औरतें
देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!

अरे वाह !क्या बात है !!
बहुत बढ़िया !!

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब! कविता सहज और सटीक है!

sushma 'आहुति' ने कहा…

bhut hi khubsurat abhivakti....

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

waakai mein....kya farq padta hai!

rashmi ravija ने कहा…

अच्छी कविता....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल ३० - ६ - २०११ को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज -

निवेदिता ने कहा…

ये उदासीनता आत्मघाती लगती है ....

निवेदिता ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!
--
इसी में भलाई है जी!
कम से कम अच्छेपन का आभास तो हो ही रहा है!

Sudam ने कहा…

Sometimes ignorance is a bliss. Common men has so many bills to pay and take care. In that case what happens in Ramlila Maidan or what Anna says has nothing to do. They get up in the morning and return in the evening. What's the use of turning on the idiot box when hunger knocks?

Whatever happens nothing will change in their lots. They are there subject to drudgery and low wage. The tragedy is that some cunning fellow dismantles their ignorance and show them lollipops. They are at their best if they happen to be in their well of ignorance, better allow them to stay there.

By the way, good verse. Thanks.

राज भाटिय़ा ने कहा…

फ़र्क तो बहुत पडता हे, लेकिन जब जनता अपने मतलब के लिये आंखे मूद ले तो यही कहते हे कि क्या फ़र्क पडता हे...
बहुत सुंदर कविता

अजय कुमार ने कहा…

देश दुनिया से उदासीन ,अपने में मगन आम जनता

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

वंदना जी, बहुत अच्छी रचना है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

यदि चंद औरतें
देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!

सच कहा आपने.....

वाणी गीत ने कहा…

कभी कभी इन लफड़ों से दूर रहना ही ज्यादा अच्छा लगता है ऐसे में उन लोगों के लिए ख़ुशी होती है जो कुछ समझते ही नहीं ...
सत्य कहा आपने !

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

बिलकुल अलग सी एक कविता ........सच के नज़दीक

डॉ .अनुराग ने कहा…

सच कहूँ तो कई पढ़ी लिखी औरतो को भी फर्क नहीं पड़ता !



मेरे दिल की बात ....

सतीश सक्सेना ने कहा…

मुझे लगता है यह बेहतर है कि जीवन ऐसे मुगालते में निकले ....कष्ट आधे रह जायेंगे !
:-)

राकेश कौशिक ने कहा…

"कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!"

मुगालते में रहना ही मुझे भी उचित लगता है - बहुत सुंदर रचना, तस्वीर और प्रस्तुति

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

हाहा.. पर उन चंद महिलाओं से दुनिया तो नहीं चलती है ना... अगर सब ऐसा करने लगे तो दुनिया राम भरोसे हो जाएगी..
पर एक तरह से अच्छा भी नहीं है.. यह कम शिक्षा का द्योतक है.. सभी का इस समाज निर्माण में साथ ज़रूरी है..

परवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
आभार

ज्योति सिंह ने कहा…

इसीलिये क्या फ़र्क पड़ता है,
यदि चंद औरतें
देश-दुनिया की खबरों में
दिलचस्पी न लें तो?
कम स कम इस मुग़ालते में तो हैं,
कि सब कुछ कितना अच्छा है!
baat to sach hai ,apni hi fikr kar le ,din duniya ki kya ?kaun in chakkr me fase isliye magaj nahi khapati ,unke paas apne aas-paas ki hi kafi khabre jama rahti hai jine masaledaar banakar aapas me hi chakhti aur chakhati rahti hai ,phir dil dahlaani wali aur badalti duniya ki khabro se kya lena .
bahut badhiya likha hai .charcha ka bishya hai .

नेपथ्य निशांत ने कहा…

फ़र्क पड़ता है, जब धुप सेंकती महिला को यह पता चलता है की किरोसिन का भाव ज्यादा हो गया है और आने वाले दिनों में उसे बाजार में अपने पसंद की चीज़ों के बजाय जरुरी सामान खरीदने में ही सारे पैसे खर्च हो जायेंगे,लेकिन फिलहाल मुगालते में ही रहना ज्यादा अच्छा है.

सुनीता शानू ने कहा…

आपकी पोस्ट की चर्चा कृपया यहाँ पढे नई पुरानी हलचल मेरा प्रथम प्रयास

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन।

सादर

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता वंदना जी ..

दरअसल हमारे समाज कि संकीर्णता ही इसको पीछे ले जा रही है .. आपने बहुत ही अच्छे शब्दों के द्वरा एक स्त्री के मन के द्वंद को कविता में पिरोया है ... बधाई

आभार
विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

रचना दीक्षित ने कहा…

अच्छी कविता,सच के बहुत नजदीक.