मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मेरी पसंद....


दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

24 टिप्‍पणियां:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

दुष्यंत जी की ग़ज़लों के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है
बहुत सुंदर!

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

क्या बात है!
जिस कवि को किसी की व्यक्तिगत आलोचना की इतनी चिंता हो उस्की रचनाएं अवश्य ही समाज के सुधार मेंअहम भूमिका निभाती हैं

धन्यवाद वंदना

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

इतनी प्यारी से गजल के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. दुष्यंत कुमार की लेखनी कुछ ऐसे ही बोलती है. फिर याद दिलाया तो बहुत अच्छा लगा.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

हिन्दी ग़ज़ल के सम्राट दुष्यंत कुमार को पढ़ना अपने आप में अलग अनुभूति है...
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।
और
दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।
कितने अलग अंदाज़ की शायरी रही है....
वंदना जी यहां प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.

अनिल कान्त : ने कहा…

मैं तो आपको, इसके लिए, धन्यवाद कहूँगा

shikha varshney ने कहा…

दुष्यंत जी कि रचनाये इतनी गहरे लिए होती हैं कि अंतस मन पर गहरा प्रभाव छोडती हैं

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।
कमाल है ..
बहुत शुक्रिया यहाँ पढवाने का.

rashmi ravija ने कहा…

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

दुष्यंत जी की ये ग़ज़ल जितनी बार पढो...नए अर्थ निकलते हैं..और हर बार गहरा प्रभाव छोड़ जाती हैं.

ऐसे ही पढवाती रहो नायाब रचनाएं

AlbelaKhatri.com ने कहा…

साधुवाद इस ग़ज़ल को प्रकाशित करने के लिए..........

बहुत दिनों बाद आपका ब्लॉग देखने को मिला,

क्या बात है, लम्बे अवकाश पर गये थे क्या ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अरे वाह..!
गजल सम्राट दुष्यन्त जी की यह गजल पढ़कर तो आनन्द आ गया!

Vivek VK Jain ने कहा…

meine 11th cls me padi thi.....tabhi se dushyant ji ka fan hu.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जितनी बार पढ़ता हूँ, झूम उठता हूँ।

वीना ने कहा…

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है
बहुत अच्छा शेर
बहुत सुंदर ग़ज़ल...धन्यवाद

रानीविशाल ने कहा…

वाह ! वाह आपकी और मेरी पसंद तो एक ही है लगता है ....बहुत बहुत धन्यवाद इस प्रस्तुति के लिए .
वैसे भी कोई बिरला ही कवि या कविता प्रेमी हो जो दुष्यंत कुमार जी से प्रभावित न हो ....

अमिताभ मीत ने कहा…

दुष्यंत कुमार .... मेरा पसंदीदा शायर .... सब से जुदा .... बेमिसाल !!

यहाँ भी दो अनमोल गज़लें देखिये ...


http://kisseykahen.blogspot.com/2008/05/blog-post_03.html


http://kisseykahen.blogspot.com/2008/04/blog-post.html

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वंदना जी ,

दुष्यंत जी की गज़ल पढवाने के लिए आभार

Babli ने कहा…

वाह! बहुत सुन्दर ग़ज़ल! पढ़कर बहुत अच्छा लगा! धन्यवाद!

शरद कोकास ने कहा…

लगे हाथ बतादूँ कि दुश्यंत जी मुझे इतने पसन्द हैं कि किताब दुकान मे न मिलने पर उनकी " साये में धूप " पूरी रात बैठकर मैने अपनी डायरी में लिख डाली थी । फायदा यह हुआ कि पूरी बावन गज़लें मुझे याद हो गईं । लगभग दस गज़लों की मैंने धुने बनाईं और उन्हे गाने लगा । यह तब की बात है जब मैं उज्जैन में पढता था । फिर एक दिन एक कार्यक्रम मे एक गज़ल " मैं जिसे ओढता बिछाता हूँ " गाकर सुनाई और सुमन जी ने पीठ ठोंकी और राजी आंटी ( दुश्यंत जी की पत्नी ) ने अश्रुपूरित नयनों से गले से लगा लिया ।
ओह.... तो यह पूरा किस्सा ब्लॉग पर लिखा जा सकता है ना ...?

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

ज़रूर लिखा जा सकता है शरद जी, बल्कि लिख ही डालिये. नेक काम में देरी क्यों?

बेनामी ने कहा…

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सतीश सक्सेना ने कहा…

वाह वाह !
दुष्यंत जी को पढवाने के लिए आभार

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने .......

थोडा समय यहाँ भी दे :-
आपको कितने दिन लगेंगे, बताना जरुर ?....

Vijai Mathur ने कहा…

Vandnaji,
aapne vidrohiswar dekha aur meri safalta ki kamna ki -bahaut-2 dhanyawad.Dushyantji ki prastut kavita yatharth ka chitran karti hai,yah to achcha kahtey hi hain.

ZEAL ने कहा…

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

sundar rachna . !

.

ZEAL ने कहा…

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

This couplet is even better than the previous one !

.

VIJAY TIWARI 'KISLAY' ने कहा…

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

वंदना जी अच्छा संकलन है
- विजय तिवारी