शनिवार, 29 मई 2010

मेरी पसंद....

मेरे हमराह मेरा साया है
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ

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आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में था
सारे दरख्त झुकने को तैयार हो गए

तालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनर
दौलत के सामने सभी बेकार हो गए

फिर यूँ हुआ कि सबने उठा ली क़सम यहाँ
फिर यूँ हुआ कि लोग ज़बानों से कट गए

सर्वत एम. जमाल
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जिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद में
हवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूं

फसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं

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ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

नीरज गोस्वामी
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कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।

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न तो मेरे ख़त का उत्‍तर, न शिकायत, न गिला,
क्‍या हमारे बीच में रिश्‍ता बचा कुछ भी नहीं।

सुब्‍ह से विद्वान कुछ, सर जोड़ कर बैठे हैं पर,
मैनें पूछा तो वो बोले मस्‍अला कुछ भी नहीं ।

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एक कपड़ा मिल गया तो खुश ये बच्‍चे हो गये,
इनके कद से भी बड़ी इनकी कमीज़ें देखिये।

तिलकराज कपूर.
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मुश्किलों में कोशिशें मत छोड़िये कुछ कीजिये
इन ही तदबीरों से बदलेगा मुकद्दर देखना

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हां, मैं तुझसे हूं, मगर मेरा भी है अपना वजूद
पत्ते गिर जायेंगे तो, साया कहां रह जाएगा

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सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

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संदेश इनके प्यार का किसने चुरा लिया,
अंदेशा लेके आते हैं त्यौहार किसलिए ?

जब इसका इल्म था कि ये धोया न जायेगा,
मैला किया था आपने किरदार किसलिए ?

शाहिद मिर्ज़ा"शाहिद"
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गर प्यार न हो तो, ये जहां है भी नहीं भी
होंगे न मकीं गर,तो मकां है भी नहीं भी

लब बंद हैं ,दम घुटता है सीने में ’शेफ़ा’ का
हक़ कहने को इस मुंह में ज़बां है भी नहीं भी

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जो किसी के काम ही आए नहीं
हैफ़ ऐसी ज़िंदगी बेकार है,

भूल जाए गर ’शेफ़ा’ एख़्लाक़ियात
फिर तो तेरी ज़हनियत बीमार है

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मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

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उलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश में
कि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना

इस्मत जैदी "शेफा कजगांववी"
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उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

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कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

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गर इजाज़त दे ज़माना, तो मैं जी लूँ इक ख़्वाब
बेड़ियाँ तोड़ के आवारा हवा हो जाऊँ
श्रद्धा जैन
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जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी उतर गईं
आँधी में ऐसा पेड़ उखड़ता नहीं कभी

मुझसा मुझे भी चाहिए सूरज ने ये कहा
साया मेरा ज़मीन पे पड़ता नहीं कभी

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बुझा रही है चराग़ों को वक़्त से पहले
न जाने किसके इशारों पे चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन
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सौदा हुआ तो क्या हुआ दो कौड़ियों के दाम
सस्ता न इतना ख़ुद को बना दें तो ठीक है

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फुरसत मिले तो इनको ज़रा पढ़ भी लीजिए !
कुरान, बाईबल और गीता हैं बेटियां !!

नन्ही कली ओ बादे-सबा 'दर्द' की गज़ल !
क्या-क्या बताऊं आपको क्या-क्या हैं बेटियां !!
दर्द शुजालपुरी
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28 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिँह बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।आभार।

अर्कजेश ने कहा…

गर प्यार न हो तो, ये जहां है भी नहीं भी
होंगे न मकीं गर,तो मकां है भी नहीं भी


आपकी पसंद के क्‍या कहने !

बेचैन आत्मा ने कहा…

सुंदर संग्रह ..सभी एक से बढ़कर एक.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी पसन्द लाजवाब है!

वन्दना ने कहा…

aapki pasand to gazab ki hai........kal ke charcha manch par hogi aapki pasand.

sangeeta swarup ने कहा…

आपने बहुत सुन्दर रचनाये अलग अलग रचनाकारों की अलग अलग रंग लिए एक साथ पढ़ायीं....आभार

राज भाटिय़ा ने कहा…

सभी रचनाये बहुत सुंदर,धन्यवाद आप का

sanu shukla ने कहा…

uttam sangrah...
dhanywad

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

एक ही जगह इतनी सुंदर रचनाएं ! धन्यवाद.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद....
अरे....
ये तो खुद की तारीफ़ भी हो गई...
ख़ता मुआफ़....

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वंदना ,
किस किस शेर का जिक्र करूँ. , तुमने तो सारे मोतियों से पिरोकर जो माला पेश की, जी चाहता है कि उनको गले में डाल दूं.
बहुत सुंदर शेर चुने हैं. सब सबको कहाँ देखने को मिलते हैं और पढ़ने को भी. जिसको जो मोती मिले उठाये और सबको नजर कर दे.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन पसंद...
नीरज

दीपक 'मशाल' ने कहा…

बहुत सही पसंद.. इन्हें मेरी भी मान लीजिये..

dr. kamal ajanabi ने कहा…

सभी रचनाकारों के चुनिंदा शेर पढवा कर आपने बहुत अच्छा कार्य किया है. आप बधाई के काबिल हैं. आभार.

सर्वत एम० ने कहा…

सबसे पहले मैं आपकी पसंद बने सभी रचनाकारों की तरफ से आपका शुक्रिया, आभार प्रकट करता हूँ.
मेरे अशआर आपकी पसंद की फेहरिस्त में, वो भी सबसे पहले स्थान पर, आँखों को यकीन तो आते आते आया. ब्लॉग खुलते ही अपने शेर नजर आए, मैं स्तब्ध रह गया. अभी कुछ ही दिन पहले, श्रद्धा जैन की गजलें चुरा कर कुछ बन्दों ने अपने ब्लॉग पर लगा रखी थीं. मैं सोचने लगा, क्या वन्दना जी भी! वो भी खुले आम!
लेकिन फिर शीर्षक पर नजर पड़ी, जान में जान आ गयी. इतने महान लोगों के बीच खुद को पा कर शर्मिन्दगी सी महसूस हो रही है. एक खुशी है जो सबसे बड़ी है... आम लोग पसंद करते है, सामान्य बात है. लेकिन एक वरिष्ठ रचनाकार पसंद करे... शब्द नहीं हैं.

तिलक राज कपूर ने कहा…

मैनें तो जो मन में था वो कह डाला,
जिसने जैसा समझा उसकी वो जाने।
मेरा कोई शेर किसी को इतना पसंद आये कि वह यह व्‍यक्‍त करे यह निश्चित ही मेरे लिये व्‍यक्तिगत आभार प्रदर्शन की स्थिति है।
आभारी हूँ।

dwij ने कहा…

तमाम ख़ूबसूरत शे'रों का चयन आपकी गहरी
संवेदनशीलता का परिचायक है.
बधाई
.
आभार
.
saadar


www.dwijendradwij.blogspot.com
www.janganhman.blogspot.com

ज्योति सिंह ने कहा…

waah laazwaab hi nahi ek se badhkar ek hai saare .bha gaye .

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी उतर गईं
आँधी में ऐसा पेड़ उखड़ता नहीं कभी

कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़


संदेश इनके प्यार का किसने चुरा लिया,
अंदेशा लेके आते हैं त्यौहार किसलिए ?

जब इसका इल्म था कि ये धोया न जायेगा,
मैला किया था आपने किरदार किसलिए ?

सुब्‍ह से विद्वान कुछ, सर जोड़ कर बैठे हैं पर,
मैनें पूछा तो वो बोले मस्‍अला कुछ भी नहीं


फसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं


आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में था
सारे दरख्त झुकने को तैयार हो गए

तालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनर
दौलत के सामने सभी बेकार हो गए

बेहद ख़ूबसूरत अश’आर हैं ये जिन का तुम ने चयन किया है ,मज़ा आ गया ,लेकिन ऐसे अज़ीम शो’अरा के बीच ख़ुद को पा कर बहुत अजीब सा लग रहा है ,
कहीं तुम ने दोस्ती तो नहीं निभाई?
कुछ लोगों के नाम जो इन में नहीं हैं,शायद अगली पोस्ट में पढ़ने को मिलेंगे ,मिलेंगे न ?

Gaurtalab ने कहा…

Wah kya baat hai..ab tak kyon najar nahi aaya tha

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत मेहनत का काम हैं मेहनत दिख रही है वाह क्या खूब !!!!!!!!

सतीश सक्सेना ने कहा…

क्या गज़ब का कलेक्शन लाईन हैं यहाँ , चुनींदा और अपने क्षेत्र में बेहद सम्मानित इन रचनाकारों के इस संकलन में वाकई आनंद आ गया ! आपके इस नए प्रयोग के लिए शुभकामनायें !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

इन शानदार रचनाओं को एक साथ पढवाने का शुक्रिया। वैसे आपकी पसंद की दाद देनी पडेगी।
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ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

Kishore Choudhary ने कहा…

आपकी पसंद तो हमारी पसंद बन गई है.

Rajendra Swarnkar ने कहा…

वन्दना अवस्थी दुबे जी
घूमते घामते आपकी इस पोस्ट तक पहुंचा
तो सु्खद् अनुभव हुआ ।
अच्छे अश्आर संकलित किए हैं । बधाई और आभार !
लेकिन सर्वतजी , इस्मतजी सहित कई शोअरा' जिनके अश्आर आपने शामिल किए , उनको भी पोस्ट देखने के बाद पता चलना कुछ अज़ीब लगा ।
रचनाकार को भी इच्छा रहती है कि उसे पढ़ा तो जाए , लेकिन उसकी रचना कहां कहां शामिल है , उसे भी पता हो ।
बड़ी मेह्रबानी , बुरा न मानें जैसा महसूस हुआ , कह दिया । आप ख़ुद हुनरमंद फ़नकार होने के साथ कद्रदान भी हैं , इसलिए आपको मेरे ब्लॉग शस्वरं पर आने का भी आमंत्रण है ।
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

राजेन्द्र जी, ब्लॉग तक आने के लिये शुक्रिया.
हो सकता है कि आप सही हों, लेकिन मैं आपको बता दूं , कि जब मैं अपने इस मेरी पसंद कॉलम में किसी स्थापित, जीवित शायर/कवि की रचना लेती हूं, तो उसे सूचित नहीं करती, और जिन रचनाकारों को मैने इस पोस्ट में शामिल किया, उन्हें मैं किसी भी स्थापित रचनाकार से कम नहीं समझती. उम्मीद है, मेरा आशय समझ रहे होंगे.

सुमन कुमार ने कहा…

इन शानदार रचनाओं को एक साथ पढवाने का शुक्रिया।

Maria Mcclain ने कहा…

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