रविवार, 4 अप्रैल 2010

मेरी पसंद....







हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।



मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।



जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।



जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।



लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।



जब मुसीबत पड़े, और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।



० कन्हैयालाल नंदन

33 टिप्‍पणियां:

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…

हर सुबह को दोपहर चाहिए...
...लेकिन यहाँ तो लोग लकीर को पकड़कर बैठे रहते हैं....अच्छी कविता....
http://laddoospeaks.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अच्छी कविता पढ़वाने के लिये धन्यवाद ।

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

bahut acchhi kavita..ise padhane k liye dhanyewad.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

बहुत सुन्दर पसंद है आपकी ,लाजवाब रचना.

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत सुन्दर पसंद है आपकी! शुक्रिया इसे फ़िर से पढ़वाने के लिये। यह कविता नन्दनजी ने लिखी जब वे आल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ़ मेडिकल साइंस में 03/10/05 को डायलिसिस करा रहे थे। बाद में इसकी अपनी हस्तलिखित प्रतिलिपि भी दी थी उन्होंने मुझे। एक कवि मन की सच्ची भाववायें हैं इसमें।

राकेश कौशिक ने कहा…

सुंदर कविता पढवाने के लिए आभार

मनोज कुमार ने कहा…

नंदन जी की कविता पढवाने के लिए आभार। बचपन में पढी पत्रिका "पराग" की याद आ गई।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वन्दना ,कन्हैया लाल नन्दन जी मेरे पसन्दीदा कवियों में से एक हैं ,
धन्यवाद कि इतनी अच्छी ग़ज़ल पढ़्वाई तुम ने ख़ास तौर पर ये शेर ,,,,,,,,,

मैं ने मांगी.........
और
जब मुसीबत...........

बहुत ख़ूबसूरत

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

टिप्पणी के इन स्वरों में स्वर हमारा बज रहा है!
आपके इस ब्लॉग पर यह गीत सुन्दर सज रहा है!

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

वंदना जी बहुत सुंदर ग़ज़ल..कन्हैयालाल नंदन जी को बधाई देना चाहता हूँ साथ ही साथ आपको भी जो भावनाओं से सजी एक बेहतरीन ग़ज़ल प्रस्तुति किया..

Shekhar kumawat ने कहा…

ab to ham rab se karte he duwa ki
aap ki umer so sal honi chahiye

bahut sundar rachna badhai aap ko

rashmi ravija ने कहा…

बड़ी अच्छी कविता पढवाई कन्हैया अंकल की...पराग के संपादक थे,तब से उनके लिए अंकल शब्द ही ज़ेहन में आता है...और बहुत अपने से लगते थे ये अंकल..ज़ाहिर है उनका लिखा भी कुछ ख़ास ही लगेगा...वैसे भी बहुत सुन्दर रचना है...


ज़िन्दगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

बहुत खूब..इतनी सुन्दर ग़ज़ल पढवाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

नन्दन जी सरीखे व्यक्तित्व की गज़ल पढवाने के लिये आभार
बहुत सुन्दर गज़ल

Suman ने कहा…

nice

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।

जब मुसीबत पड़े, और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।
=======================
बहुत अच्छे भावों की प्रस्तुति की गई है
मुझे जो शेर सबसे ज्यादा पसंद आया वो है --
जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।
- विजय तिवारी 'किसलय '

ज्योति सिंह ने कहा…

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।

जब मुसीबत पड़े, और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।
bahut bahut sundar mujhe har baat laazwaab lagi .

देवेश प्रताप ने कहा…

लाजवाब रचना ....पढवाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बढ़िया पसंद है शुक्रिया

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत लाजवाब,हर इक बात बहुत गहरी.इतनी बेहतरीन प्रस्तुती के लिए आभार

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर कविता
आप का धन्यवाद

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

bahut khoob .....!!

सर्वत एम० ने कहा…

कितने लोग हैं जो दूसरों को सम्मान देते हैं? कितने हैं जो अपने लेखन के आगे किसी अन्य के लेखन को महत्व देते हैं? कितने रचनाकार स्वयं के अलावा दूसरों का लिखा-पढ़ा भी याद रखते हैं? निस्संदेह आटे में नमक बराबर.
आपको सलाम कि आप दूसरों को न सिर्फ महत्व देती हैं बल्कि उसे अपनी पसंद बताकर हम जैसों के समक्ष रखती भी हैं.
ज्यादा दिनों के बाद आया हूँ, क्षमा ही चाहूँगा. रोज़गार चैन से बैठने नहीं देता. लेकिन आप और आपका ब्लॉग, बल्कि आप जैसे बहुत सारे मित्र याद रहते हैं.
ब्लॉग पर न आ सकूं फिर भी जहन में सारी स्मृतियाँ ऊर्जा देती रहती हैं.

Babli ने कहा…

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।
लाजवाब पंक्तियाँ! बहुत बढ़िया लगा! सुन्दर कविता!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।

वंदना जी.....लाजवाब और बेशक़ीमती है आपकी पसंद

PRAN SHARMA ने कहा…

Maine maangee duayen,duaayen milee
un duaon kaa mujhpe asar chaahiye
--------------
jismein rahkar sukunse guzara karun
mujhko ahsaas kaa aesa ghar chahiye
Wah,kyaa baat hai in
ashaar mein.Dil mein utar gye hain.
Nandan aur aapko badhaaee aur
shubh kamna.

अल्पना वर्मा ने कहा…

ये रचना पहले भी पढ़ी है..बहुत अच्छी है.
आप की पसंद लाजवाब है.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

आपकी पसंद हमें भी पसंद आई!
--
रंग-रँगीला जोकर
माँग नहीं सकता न, प्यारे-प्यारे, मस्त नज़ारे!
--
संपादक : सरस पायस

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

एक बेहद ही उम्‍दा गजल पढवाने के लिये शुक्रिया वन्‍दना जी और शुक्रिया जनाब कन्‍हैयालाल जी का जिन्‍होंने एक खूबसूरत सी रचना से रूबरू करवाया | आभार ।।

माणिक ने कहा…

बहुत हार्दिक कविता लेखन किया है. जारी रखें.
सादर,

माणिक
आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से जुड़ाव
APNI MAATI
MANIKNAAMAA

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" ने कहा…

मेरा प्रणाम ! पहुँच नहीं अभी तक ...........शायद अटक गया हो कही ..............

सतीश सक्सेना ने कहा…

नंदन जी की मधुर कविता पढवाने के लिए आपका आभार वंदना जी !

शरद कोकास ने कहा…

नन्दन जी की यह रचना पढ़वाने के लिये बहुत आभारी हूँ आपका । बरसों पहले नंदन जी से हुई मुलाकात याद आ गई ।