शनिवार, 20 मार्च 2010

नहीं चाहिये आदि को कुछ....


"ये क्या है मौली दीदी?"
" आई-पॉड है."
"ये क्या होता है?"
" अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?"
इतना सा मुंह निकल आया आदि का. क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है.
"अरे पागल, ये आई-पॉड है, इसमें बहुत सारे गाने भरे हैं. पांच सौ से ज्यादा गाने डाउन-लोड कर सकती हूँ मैं इसमें. और हाँ ये एम्.पी. फ़ोर है."
" इत्ते सारे गाने? इसमें??? ..............वैसे मौली दी, ये एम्. पी. फ़ोर क्या है......?"
पूछते हुए अपने आप में सिमट गया था आदि, पता नहीं अब कौन से विशेषण से नवाज़ा जाएगा उसे..........
" अरे इधर आओ बसंतकुमार, मैं तुम्हें समझाती हूँ. "
आदि झिझकते-सकुचाते मौली के पास बैठ गया.
" ये देख , स्क्रीन दिखता है इसमें?"
"............................"
" दिखता है या नहीं?"
' दिखता तो है"
' तो जब हम कोई वीडियो क्लिप इसमें डाउन-लोड करेंगे तो वो हमें इसी स्क्रीन पर दिखाई देगी. समझा कुछ?"
" हां...समझा तो...."
" और गाने सुनने के लिए वही, ईयरफोन"
" ये कितने का आता है मौली दी?"
" मंहगा नहीं है यार, बस टू थाऊजंड का है."
" टू थाऊजंड..........यानि सौ के कितने नोट मौली दी..?"
सात साल का आदि , मुश्किल में पड़ गया था.........
" अरे बुद्धू, हंड्रेड के ट्वेंटी नोट यानि सौ-सौ के बीस नोट."
" सौ -सौ के बीस नोट.................... तब तो बहुत सारे रूपये चाहिए....."
" अब इतने सारे भी नहीं हैं ये. अपने पापा से कहना, तो वे ला देंगे तुम्हारे लिए."
बारह साल की मौली ने अपना ज्ञान बघारा.
आदि, यानि पांडे जी का छोटा बेटा, जब भी मौली के घर जाता है, चमत्कृत होता है. कितना बड़ा घर, कितना सारा सामान..... सबके अलग-अलग कमरे..
कितने सारे सामानों के तो नाम ही नहीं जानता आदि.... वो तो मौली दी बहुत अच्छी हैं, सब सामानों के बारे में बताती हैं.
आदि हमेशा सोचता है, उसका घर मौली के घर जैसा क्यों नहीं है? हम लोग किराए के घर में क्यों रहते हैं? मौली दी कोई फरमाइश करें, तो उनके मम्मी-पापा तुरंत पूरी करते हैं, मेरी फरमाइशें क्यों पूरी नहीं होतीं? जब भी कुछ मांगो तो फट से सुन लो " हमारे पास पैसों का पेड़ नहीं है, जो तोड़-तोड़ के तुम्हारी ऊटपटांग मांगें पूरी करते रहें."
मौली दी के बगीचे में पैसों का पेड़ लगा है क्या?
ज़रूर लगा होगा ! उसी से तोड़-तोड़ के सामान खरीदते होंगे.
आदि को मौली के घर में रहना बहुत अच्छा लगता है. सब एक दूसरे से कितने प्यार से बातें करते हैं. आदि भी पूरे घर में कहीं भी आ-जा सकता है. कोई मनाही नहीं. उसके घर में तो जब देखो तब चख-चख . मम्मी कुछ घरीद लें, तो पापा घर सिर पे उठा लेते हैं. कितना चिल्लाते हैं! दिन रात खटने की दुहाई देते हैं. हर बात में कह देते हैं, पैसा नहीं है....
पता नहीं , पैसों का पेड़ क्यों नहीं लगा लेते.....पौधा तो मौली दी के घर से मिल ही जाएगा. शायद कलम लगती हो.........
पूछेगा आदि मौली से.
मौली दी के पापा कितने अच्छे हैं. कितनी बड़ी बड़ी चॉकलेट लाते हैं उनके लिए. आदि को सब चॉकलेटों के नाम और स्वाद मालूम हैं. मौली दी उसे भी खिलाती हैं न! चॉकलेट खाने के बाद जब मौली दी उसका रैपर फ़ेंक देतीं हैं , तो आदि चुपचाप उसे उठा लेता है, एकदम नज़र बचा के. पूरा डिटेल पढ़ता है. बार-बार सूंघता है रैपर को ...और फिर सहेज के रख लेता है.
आदि के पापा तो कभी चॉकलेट खरीदते ही नहीं. कभी-कभार टॉफी ला देते हैं, तो वो भी बस दो-दो ही मिलतीं हैं दोनों भाइयों को. और मांगो तो डपट देते हैं कि " दाँत खराब करना हैं क्या?"
मौली दी के दाँत तो एकदम सफ़ेद हैं.....................
मौली दी के पापा गाड़ी से ऑफिस जाते हैं. एकदम चमाचम गाड़ी. सुबह सबसे पहले उनका नौकर गाड़ी ही साफ़ करता है. मौली दी का नौकर उनकी गाड़ी, और उसके पापा अपनी साइकिल लगभग एक ही समय पर साफ़ करते हैं.
अच्छा नहीं लगता आदि को......................
उसके पापा गाड़ी क्यों नहीं खरीदते? पूछा था आदि ने पापा से, लेकिन उन्होंने हंसी में उड़ा दिया.....आदि समझ ही नहीं पाता पापा की बातें.
लेकिन आदि को मौली दी की तरह रहना अच्छा लगता है. उसके दोनों दोस्त , रोहन और अनवर भी तो मौली दी की तरह ही रहते हैं. पैरेंट्स-मीटिंग में उनके पापा भी तो गाडी से ही आते हैं. लेकिन आदि के पापा....................
पिछली बार साइकिल के डंडे पर बैठा आदि कितना शर्मिंदा हो गया था , जब रोहन की गाडी ठीक उसकी बगल में आकर खड़ी हो गई थी.
अब तो आदि भी कई बार झूठ बोल देता है............. सब बड़ी-बड़ी बातें हैं.....अगर वो झूठ न बोले और बता दे कि उसका कोई कमरा नहीं , वो तो रात को बाबा आदम के ज़माने के , तांत की बुनाई वाले सोफे पर सोता है, तो कौन उससे दोस्ती करेगा? भला हो मौली दी का , जिनके कारण न केवल उसे हर आधुनिकतम सामान देखने को मिलता है, बल्कि उनका इस्तेमाल भी जानता है. इसीलिये अपने दोस्तों के बीच किसी भी सामान के बारे में ऐसे बताता है , जैसे वो मौली का नहीं, उसका खुद का हो.
काश! उसने मौली के घर जन्म लिया होता!
अपने घर में वो जब भी आसनी बिछा के खाना खाने बैठता है तो उसे मौली दी की डाइनिंग टेबल खूब-खूब याद आने लगती है. चमकती हुई...शीशे की.....उस पर क्रॉकरी....
कितनी नफ़ासत से सब थोडा-थोडा खाना निकालते हैं प्लेट में...
उसके पापा तो जब खाना खाने बैठते हैं , तो मम्मी रोटियों कि पूरी गड्डी ही रख देतीं हैं थाली में. सब्जी भी ऊपर तक भर देतीं हैं कटोरी में. मौली दी के यहाँ खाते समय कोई आवाजें नहीं करता, और आदि के यहाँ?
पापा तो इतनी आवाजें करते हैं न, कि दूसरे कमरे में बैठा आदि बता सकता है, कि वे कब क्या खा रहे हैं. चाय भी ऐसे सुड़क-सुड़क के पीते हैं, कि आदि सोते से जाग जाता है.
पहले आदि को पापा की सारी आदतें बहुत अच्छी लगतीं थीं. वो भी चाय सुड़कने लगा था. लेकिन मौली दी की मम्मी ने समझाया , उसने चाय सुडकना बंद कर दिया.
समझाया तो उन्होंने ये भी था कि बच्चे चाय नहीं पीते, तुम दूध पिया करो.
उसने मम्मी से कहा भी था कि वे उसे दूध दिया करें. लेकिन मम्मी ने कहा कि अभी कुछ दिन चाय पियो, फिर अगले महीने से दूध बढ़ा लेंगीं. लेकिन वो अगला महीना आया ही नहीं......
उसकी कोई भी बात मम्मी पूरी नहीं करतीं. पिछली बार अपने जन्मदिन पर आदि ने कहा था कि उसे भी मौली दी की तरह केक काटना है. मौली दी से कन्फेक्शनरी का पता भी ले आया था. पापा गए भी थे दुकान तक, लेकिन फिर बिना केक के लौट आये . बोले- बहुत मंहगे है. मम्मी झट से बोलीं- मैं घर में बना दूँगी. आदि खुश.
लेकिन मम्मी ने क्या किया? हलवा बना के उसी को केक के आकार में जमा दिया!
कितनी अच्छी हैं मौली दी की मम्मी.....एक उसकी मम्मी हैं...दिन भर काम करतीं हैं, और अपनी ही साडी से हाथ पोंछतीं रहतीं हैं. कभी आदि को डांटती हैं कभी भैया को.
काश! मौली दी कि मम्मी उसकी मम्मी होतीं.................
सुबह देर से आँख खुली थी आदि की. किसी ने जगाया ही नहीं. जब उठा तो घर कितना सूना-सूना लग रहा था. न मम्मी कि आवाजें न पापा कीं. कहाँ गए ये लोग?
अन्दर से बाहर तक ढूंढ लिया मम्मी को, नहीं मिलीं. केवल भैया बाहर बैठा था. उसी ने बताया कि बड़े सबेरे मम्मी कि तबिअत अचानक ही ख़राब हो गई, तो पापा उन्हें हॉस्पिटल ले गए हैं. और ये भी कि दस बजे जब भैया स्कूल जाएगा तब आदि को मौली के घर छोड़ देगा, पूरे दिन के लिए.
मौली दी के घर! पूरे दिन!! बांछें खिल गईं आदि कीं. मम्मी बीमार हैं, ये भी भूल गया. फटाफट नहा-धोकर तैयार हो गया.
मौली दी भी उस समय स्कूल में थीं, जब आदि उनके घर पहुंचा. आंटी ने उसे ढेर सारी स्टोरी बुक्स दे दीं.
लेकिन कितनी देर पढता आदि? थोड़ी देर में ही बोर होने लगा. तभी आंटी ने उसे ब्रेक-फास्ट के लिए बुलाया . आदि प्रसन्न. टेबल पर आंटी, अंकल और आदि. आंटी ने टोस्ट पर बटर लगाया, प्लेट उसकी ओर खिसकाई.
गपागप खा गया आदि. और की इच्छा थी, लेकिन मांगे कैसे? सब दो पीस ही खा रहे थे. उसका घर होता तो मम्मी पहले ही चार ब्रेड देतीं.
फिर लंच के समय भी............
उसका मन हो रहा था कि कुर्सी पर ही आलथी-पालथी लगा के बैठ जाए लेकिन............
मन हो रहा था कि चम्मच फेंक के , पूरी कटोरी की दाल चावल में उड़ेल के, हाथ से खा ले, जल्दी-जल्दी लेकिन..................
बहुत बंधा-बंधा सा महसूस कर रहा था आदि................मम्मी की याद आ रही थी. पता नहीं उन्हें क्या हो गया? अपने घर की भी बहुत याद आ रही थी. शाम होते-होते उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, न कम्प्यूटर, न वीडियो गेम न और कुछ......................
" आदि आओ बेटा....." पापा की आवाज़ सुन उछाल पड़ा आदि, जैसे बरसों बाद सुनी हो ये आवाज़. लगा कितने दिन हो गए, घर छोड़े...............
दौड़ता हुआ बाहर आया. मौली दी को बाय तक कहना भूल गया.........
घर पहुँच के मम्मी से लिपट गया आदि. कितना सुकून......................कितना सुख. न नहीं चाहिए उसे मौली का घर, मौली की मम्मी.
भैया चाय बना लाया था. पापा अपने चिर-परिचित अंदाज़ में सुडकने लगे. आदि मुस्कुराया. अपना कप उठाया, प्लेट में चाय डाली, और खूब जोर से सुड़क गया.

चित्र: गूगल सर्च से साभार.

48 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

vandana ji

sach kaisa bhi ho sach hi hota hai aur use baalman bhi samajhta hai phir chahe der se hi kyun na samjhe............bahut hi shikshaprad kahani hai dil ko choo gayi..........ek sans mein hi poori padh li.

Suman ने कहा…

nice

'अदा' ने कहा…

vandana ji,
bahut hi sundar kahan lagi aapki..
yah sach hai insaan apne parivesh mein jitna khush rehta hai utna kahin nahi...
HOME SWEET HOME isiliye to kaha gaya hai...duniya ke kisi bhi 5-star hotel mei raheye...khushi apne ghar ki rasoi mein hi milti hai...
aur jeewan mein chhoti-chhoti khushiyaan hi maayne rakhti hain...
betarteeb sa jeewan hi sukhkar hota hai...ghar ko ghar jaisa hi hona chahiye museum nahi..
sundar kahani...accha sandesh de rahi hai..

देवेश प्रताप ने कहा…

अंतरात्मा को छु गयी .......ये कहानी ..........वो कहते है न ....''स्वर्ग से सुन्दर अपना घर''

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

कमाल है; इतनी सहजता से लिखा जा सकता है। और हम तो शब्द खोजने बनाने में ही खोटा कर देते हैं टाइम। :(

बहुत सुन्दर रचना।

विजयप्रकाश ने कहा…

बहुत सुंदर...इस कथा में आपने बालमन का सुंदर चित्रण किया है.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

बहुत उम्दा,बेहतरीन प्रस्तुति.

Arvind Mishra ने कहा…

भाव प्रवण !

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

wow...

this is brilliant Vandana ji..

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर ओर रोचक लगी यह कहानी, ओर कई जगह हम खुद को आदि की जगह पाते है. धन्यवाद

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

गुरुजी,
कक्षा में उपस्थित होने में बहुत देर तो नहीं हुई न ?
बाल-मनोरचना को समझना आसान नहीं है और उसका चित्रण तो सचमुच अत्यंत कठिन है ! आपकी कलम ने उस कठिन-कर्म को अद्भुत कुशलता से पूरा किया है ! अप्रतिम बाल-कथा ! निर्दोष 'आदि' का चरित्र मन को बाँध लेता है--मनोहारी लेखन ! महादेवीजी जब अपनी गाय. बिल्ली को चित्रित करती हैं तो उनकी सिद्ध लेखनी जादू-सा असर करती है ! आपकी कलम भी जादू पैदा करने में सफल हुई है ! बधाई !!
आप जानती हैं, 'आदि' से भी छोटे 'ऋतज' इन दिनों मेरे पास हैं, उनकी कलाएं देख-देख के हम निहाल हुए जाते हैं, 'आदि-कथा' पढ़ के परमानंद हुआ !
मेरी शुभकामनाएं !
--anand.

शोभना चौरे ने कहा…

balman ko bahut hi khubsurti se ukera hai aapne kahani me ak sath hi kai sandes de gai hai aapki khni .
vandnaji badhai

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह जी बहुत सुंदर.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वन्दना जी!
कथा लिखने में आप बहुत ही चतुर हैं!
यह कथा इसका प्रमाण है!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बना बना के जो दुनिया मिटाई जाती है
ज़रूर कोई कमी है, जो पाई जाती है....


परम श्रद्धेय वंदना जी, सादर प्रणाम
आपकी लेखनी का शानदार जादू है कहानी में....
’आदि’ की मनोस्थिति के शब्द चित्रण पर..
अपना एक शेर याद आ गया....
अपनी तहज़ीब-ओ-रिवायत का चलन भूला नहीं
गांव से रिश्ता मेरा पूरी तरह टूटा नहीं.....

Babli ने कहा…

नए अंदाज़ में आपने बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती !

Udan Tashtari ने कहा…

बाल में का इतना बेहतरीन चित्रण...वाह!! दिल खुश हो गया...बहुत जबरदस्त लेखनी..बधाई!!

तिलक राज कपूर ने कहा…

अब इन बच्‍चों को कौन समझाये कि:
कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमॉं नहीं मिलता।
ये बड़ों का दायित्‍व है कि बच्‍चों का ध्‍यान इस पर भी आकर्षित करें।
बच्‍चे वह सब समझने को तैयार रहते हैं जो हम उन्‍हें समझाना चाहते हैं।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब!क्या खूब अंदाज है लिखने का। वाह! बधाई!

Ravindra Ravi ने कहा…

बहुत बढिया वंदनाजी.

शरद कोकास ने कहा…

बच्चों के मनोविज्ञान को समझने के लिये बड़ो का फिर एक बार बच्चा बनना ज़रूरी है लेकिन जो ऐसा नहीं कर सकते वे इस कथा को पढ़ें ।

वाणी गीत ने कहा…

बच्चों के ही नहीं ...बच्चों जैसे बड़ों के मनोविज्ञान को समझने के लिए भी अपने दिल को बच्चा बनाना पड़ता है ...और आपने ये खूब किया ...

एक अध्यात्मिक सन्देश भी मुझे इसमें नजर आ रहा है ...परायी थाली में घी ज्यादा नजर आता है मगर ज्यादा देर तक नहीं ...बाहरी चकाचौंध कुछ देर ही दूसरों को आकर्षित कर सकती है आखिर तो राह अपनी आत्मा का उजास ही दिखाता है ...

आभार ...!!

Vivek Rastogi ने कहा…

ओह इस कहानी ने तो बहुत कुछ वापिस से सोचने पर मजबूर कर दिया, सीधे दिलो-दिमाग पर प्रहार करने वाली सशक्त कहानी। एक एक पात्र की भावनाओं को बहुत अच्छे से उकेरा गया खासकर, आदि !!

अजय कुमार झा ने कहा…

क्या कहूं कि इस कहानी से किस किस को आईना दिखा दिया आपने ..परिवार को , समाज को , सोच को , व्यवस्था को ...शायद इंसानियत को भी ...सरलता से बडी बात कह जाना ही सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है ..जो आप बखूबी निभा लेती हैं ..बहुत ही सुंदर किस्सा कहानी ...न न न ..सच सिर्फ़ एक सच ...
अजय कुमार झा

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वन्दना ,
बच्चे बने रहो कि जहां तुम जवां हुए
मिट्टी में खेलने का मज़ा भूल जाओगे

सच बाल मन को समझना और उसको इतने सशक्त शब्दों में ढाल कर कहानी का रूप देना जो कहानी नहीं बल्कि हक़ीक़त लगने लगे कोई सरल कार्य नहीं लेकिन तुम इतनी आसानी से भावों को व्यक्त कर लेती हो कि मैं तो हत्प्रभ ही रह जाती हूं ,
वैसे सच तो ये है कि ये केवल बच्चों की बात है ही नही हम बड़े भी किसी चीज़ या रिश्ते की क़द्र उस वक़्त तक नहीं करते जब तक वो आसानी से उपलब्ध हो ,उस की क़ीमत तब समझ में आती है
जब वो हम से दूर हो जाए,

बहुत बहुत बधाई एक सफल कृति के लिये

Sudam ने कहा…

Amazing flow with a happy ending. This time it is not a story about She gasping for life.



Very good. Enjoyed really.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सुंद्रर और सहज प्रवाह के साथ मन को स्पर्ष करती रचना.

रामराम.

PD ने कहा…

बहुत बढ़िया कहानी लगी.. :)

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर...इस कथा में आपने बालमन का सुंदर चित्रण किया है.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत खूबी से आपने बाल मन की भावनाओं को इस कहानी में उतार दिया है दिल को छु लेने वाली कहानी है यह ..बहुत बहुत शुक्रिया इसको पढवाने का ..

Kishore Choudhary ने कहा…

कहानी को कल ही पढ़ लिया और फिर ओझा जी का संबोधन देखता रहा, वे आपको गुरु जी कहते हैं तो मैं उससे बड़ा अभिवादन क्या लिखूं समझ नहीं आया. कहानी तो अव्वल है ही और बाल मनोविज्ञान की आपकी समझ भी. बधाइयां.

rashmi ravija ने कहा…

ये क्या लिख डाला वंदना....बहुत, बहुत सुन्दर कहानी...आदि के बालमन का इतना सुन्दर चित्रण किया कि हम सब भी पढ़ते वक़्त थोड़ी देर को आदि ही बन गए...
और चुपके से इतना सुन्दर सन्देश भी दे गयी...अपना घर, अपने रिश्तों के सामने दुनिया की सारी चकाचौंध निरर्थक है...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

ये कथा न सिर्फ गज़ब का प्रवाह रखती है बल्कि पढने वाले को अन्दर तक भिगो भी देती है...अपना घर परिवार अपना ही होता है चाहे जैसा हो, इस बात को इतने सुन्दर ढंग से कथा में पिरोया है के बरबस मुंह से वाह निकलता है...वाह...
नीरज

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

एक अच्छी और भावनात्मक कहानी के लिए आप बधाई स्वीकारें.
- विजय तिवारी 'किसलय "

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बहुत ही निराले अंदाज़ में लिखी गई
एक बहुत बढ़िया कहानी!
--
. ... ... और ख़ूब ज़ोर से सुड़क गया!
--
कहानी का अंत मुझे बहुत अच्छा लगा!

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

सादर-प्रणाम
सच इस शैली ऒर विषय-वस्तु/कथानक पर वारी जाउं दी
सादर

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

बहुत बेहतरीन कहानी ह्रदय को छू गयी और आप ने जो बाल मन का सजीव चित्रण किया है अदभुद है ,,
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

शेफाली पाण्डे ने कहा…

bahut bahut achchee kahani hai....itnee ki main bhavvibhor ho gaee...bahut sundar....kos rahee hun ki pahle kyun nahi padhee...

shama ने कहा…

Bachheke drushtikon ke likhi gayi bholi bhali kahani...kahanika ant taqreeban pata hoke bhee harek shabd padhneka man karta hai...yahi to kathakar ki shakti hai...!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

विषमताओं का बहुत सुन्दर तुलनात्मक वर्णन किया है अपने ।

समय बड़ा बलवान होता है । तीस साल पहले के बहुत से आदि अब मौली की जिंदगी जी रहे हैं।
समय कभी रुकता नहीं , उन्नति होती रहे , यही जिंदगी है।

लेकिन फिर भी , अभी भी बहुत से आदि हैं जो ३० साल बाद भी आदि ही रह गए हैं।

प्रकाश पाखी ने कहा…

आदि का बाल मन हमारे बचपन से छूकर गुजर गया...बहुत सुन्दर शिल्प से बाँध दिया एक ही सांस में पढ़ गया...सोचने लगा बचपन में ही आप इतना सुंदर लिखती थी तो अब कहानियों की यह श्रेष्ठता तो अवश्यम्भावी है--
लाख जहन्नुम से हो बदतर,अपनाघर तो अपना घर है...का संदेश पाकर सुकून मिला.

मो सम कौन ? ने कहा…

वाह वन्दना मैडम,
हम भी आदि जैसे ही हैं, दूसरों का ऐश्वर्य देखकर चकाचौंध में आ जाते हैं, पर चैन अपने स्वाभाविक स्वरूप में ही आता है। अंत तक बांधे रखा आपकी लेखनी ने।
आभार।

सागर नाहर ने कहा…

बहुत सुन्दर कथा।

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें।

सतीश सक्सेना ने कहा…

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकार करें वंदना जी !

Shekhar kumawat ने कहा…

BACHO KI BATE HE

HO TO BADI PYARI HE


wow achi rachan he
aap ko badhai



shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

♥ÐÅyÐяєÅмє®♥ ने कहा…

Bahut hi achha likha hai aapne.. main hindi blogging k sath jyada parichit nahi hoon.. par mujhe padhne mein achha laga...

meri kahani contest k liye yaha hai...

http://www.indiblogger.in/indipost.php?post=46830

padh k pasand aaye toh promote kar di jiyega

Atul Shrivastava ने कहा…

कुछ शब्‍द नही सूझ रहे कि क्‍या कहूं। बस इतना ही कि एक बार पढने के बाद कई बार पढने का मन किया। बेहतरीन।

Abhishek Arun ने कहा…

Bahut sundar rachana hai. Sidhe dil ko chu lene wali.