गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मेरी पसंद....


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है.

वे कर रहे हैं इश्क पे संजीदा गुफ़्तगु,
मैं क्या बताऊँ, मेरा कहीं और ध्यान है.

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर,
झोले में उसके पास कोई संविधान है.

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,
वो आदमी नया है मगर सावधान है.

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है.

देखे हैं हमने दौर कई, अब खबर नहीं,
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है.

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेजुबान है.

दुष्यंत कुमार


29 टिप्‍पणियां:

kase kahun?by kavita. ने कहा…

dushyan ji ka aam adami, padhvane ke liye dhanyavaad.

डॉ .अनुराग ने कहा…

padhkar hi jaan gaya ...dushyant ji hai.....

rashmi ravija ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया..वंदना जी...मुझे लगता है... दुष्यंत कुमार तो सबके फेवरेट है...उनकी रचना पढवाने के लिए आभार

हृदय पुष्प ने कहा…

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है
फिसले जो इस जगह तो लुढकते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है
सागर में मोती जैसी दुष्यंत कुमार जी की इस बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल से रूबरू कराने के लिए आभार और धन्यवाद्.

Kusum Thakur ने कहा…

दुष्यंत जी रचना पढ़वाने के लिए आभार !!

Kusum Thakur ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अजय कुमार झा ने कहा…

वाह जी क्या बात है , दुष्यंत जी को पढवाने के लिए आभार
अजय कुमार झा

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

ok, thanks.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

यह तो मेरी भी पसंद है,आभार फिर से पढवाने का.

अर्कजेश ने कहा…

वाह क्‍या कहने आपके पसंद की । यह उन गजलों में से है कि चाहे जितनी बार पढो जी नहीं भरता ।

बवाल ने कहा…

वाह वाह जी,
क्या बात है दुष्यंत जी की।
बहुत बहुत आभार उनकी याद दिलाने के लिए।

गिरिजेश राव ने कहा…

बड़ा परेशाँ है फटेहाल आदमी
झोले में अब संविधान तक नहीं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

दुश्यन्त कुमार जी की गजल पढ़वाने के लिए आपका आभार!

अनिल कान्त : ने कहा…

Dushyant ji ki likhi ye Gazal padh kar man prasann ho gaya

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

इसको पढवाने के लिएय शुक्रिया ..दुष्यंत जी का लिखा कौन भूल पाता है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

दुष्यंत जी ने आने वाले समय को बाखूबी पहचाना और अपनी कलम से ग़ज़ल को नयी दिशा दी ........... बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल लगाईं है आपने ...... बहुत बहुत शुक्रिया ...........

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

दुष्यंत जी की रचना प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ....

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल!
--
ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती, कोहरे में भोर हुई!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ", मिलत, खिलत, लजियात ... ... .
संपादक : "सरस पायस"

shikha varshney ने कहा…

dushyant ji padhwane ka bhaut abhar...vo to shayad ham sabke favt. hain.

ज्योति सिंह ने कहा…

diwane ,diwane hai hum bhi ,bhet bhi karte hai aur padhte bhi hai aksar inki pustake ,bachpan se hi lagao raha hai dushyant ji ki rachnao se ,shukriya .

सर्वत एम० ने कहा…

दुष्यंत वो अमर रचनाकार है जिस तक हर ऐरे गैरे नत्थू खैरे की पहुँच हो ही नहीं सकती. आप की पसंद हैं दुष्यंत, आपके व्यक्तित्व की ऊंचाई इसी से पता चल जाती है. आज के दौर में, जब हर कोई, समर्थ-असमर्थ तक, अपने और केवल अपने प्रचार में व्यस्त है, आप जैसे बहुत कम लोग हैं जो दूसरों, पुराने, महान रचनाकारों को महत्व देते हों.
मैं आपकी लेखनी का मुरीद था, अब मैं आपका सम्मान भी करता हूँ.

सागर ने कहा…

शुक्रिया वंदना जी... ये अच्छा किया... कई बार ब्लॉग के द्वारा भी कुछ अच्छा इस तरह का पढने मिल जाता है और यक़ीनन इसका खुमार उतारे नहीं उतरेगा..

Devendra ने कहा…

दुष्यंत जी मेरे भी प्रिय शायर हैं.

..पढाने के लिए धन्यवाद.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

वंदनाजी,
दुष्यंतजी की ये ग़ज़ल पढवा कर आपने जाने किन पुराने दिनों में जाने को मुझे विवश कर दिया है !
देर से आया, गुस्ताखी माफ़ !
सप्रीत--आ.

रचना दीक्षित ने कहा…

इतने सारे लोगों ने इतना कुछ लिख दिया की मेरे लिखने के लिए कुछ भी नहीं बचा.बस बहुत बेहतरीन

सुलभ 'सतरंगी' ने कहा…

दुष्यंत जी की ये ग़ज़ल पढ आनंदित हुआ. वंदना जी, बहुत अच्छा पोस्ट लगाया है आपने चित्र सहित.

शुक्रिया

Asha ने कहा…

A nice composition.
Your new friend
Asha

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन की हार्दिक शुभकामनायें!
ग़ज़ल बहुत अच्छा लगा!

manu ने कहा…

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए...
हमको पता नहीं था के इतना

ढलान है..

aabhaar aapkaa...