रविवार, 3 मई 2009

अनिश्चितता में...


ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे की तरफ़ चल पड़ा। रिज़र्वेशन तो था नहीं सो जनरल डिब्बे में ही घुसना था, सो घुस गया. खड़े होने लायक जगह मिल गई थी। प्लेटफार्म पर अब वे ही लोग रह गए थे जो अपने मित्रों, या रिश्तेदारों को छोड़ने आए थे ,और अब ट्रेन के चलते ही हाथ हिलाने लगे थे। इस डिब्बे में केवल मैं ही ऐसा व्यक्ति था, जिसे कोई छोड़ने नहीं आया था। ऐसा नहीं है की मेरे घर में कोई है ही नहीं मां-पापा,दो भाई सब हैं,लेकिन इन सब के होते हुए भी मैं कितना अकेला हो गया हूँ। इसी अकेलेपन से बचने, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ मैं............
'भाई साहब आप चाहें तो यहाँ बैठ जाएँ, मैं अगले स्टेशन पर ही उतारूंगा...' कोई छोटा सा स्टेशन आने वाला था पहली बार मेरी किस्मत ने साथ दिया था। ऐसी ठसाठस भरी ट्रेन में जगह मिल गई थी। आराम से बैठ कर एक मैगजीन के पन्ने पलटने लगा था। ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। मेरा घर , मेरा शहर बहुत पीछे छूट गया था।
पिछले कुछ महीनों में घर के माहौल में जो परिवर्तन आया था, वह निश्चित रूप से दुखदायी थायह परिवर्तन भी तो अचानक ही आया था। और इसकी तह में राजू, मेरे छोटे भाई की नौकरी लग जाना थाराजू की बी.ई.की डिग्री रंग लाई थी, उसका सेलेक्शन शहर के ही एक प्रतिष्ठित संस्थान में हो गया थाराजू मुझसे दो साल छोटा हैपढने में तेज़ है, इसमें कोई शक नहीं , लेकिन मैं भी तो एम्.एस.सी करके बैठा हूँ, वो भी ७५% लाकरये अलग बात है, की अब इस तरह की डिग्रियों से कुछ होता नहींशायद इसीलिए पिछले दो सालों से बेकार बैठा हूँलगातार कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहता हूँ,लेकिन हासिल क्या होता है?मैं ख़ुद से परेशान हूँराजू को छः महीने की ट्रेनिंग पर बाहर जाना था बस उसके जाते ही घर के माहौल में जिस तेज़ी के साथ परिवर्तन हुआ, उसे देखते, मह्सूते हुए घर में रह पाना बड़ा मुश्किल था, मेरे लिएअभी भी नौकरी का कोई ठीक-ठिकाना होते हुए भी मैं लखजा रहा हूँ, अपने एक दोस्त के पास , जिसने अपने ऑफिस में कोई काम की बात कर के रखी हैकुछ भी मिलेगा, कम से कम अपने आवेदन पत्र तो ख़ुद के पैसों से खरीद सकूंगा

अभी एक महीने पहले तो पापा ने साफ़-साफ़ कह दिया था। उस दिन पापा बड़े गुस्से में थेकारण, बैंक का रिज़ल्ट गया था, और में उस में भी नहीं निकल सका थादुनिया भर के सफल लड़कों के उदाहरण दे-दे कर डांटते रहे कितनी बातें सुनाईगुस्से में उनके मुंह से निकल ही गया, "आख़िर कब तक खिलाऊंगा तुम लोगों को?" लोगों को? लोग अब थे ही कहाँ? राजू की नौकरी लग गई थी , छोटा भाई अभी पढ़ रहा थायानि पापा अब सिर्फ़ मुझे ही खिलने में असमर्थ थे? मैं ही घर के लिए बोझ बन रहा थाउसी दिन मैंने सोच लिया था की अब पापा से पैसे नहीं मांगूगा कभीऔर पड़ोस के एक लड़के को ट्यूशन पढ़ने लगा थामहीने के अंत में पाँच सौ रु.मिल गए थे मुझे

वे मेरी भागदौड के प्रारम्भिक दिन थे जब मैं सोचता था की नौकरी लगते ही मैं राजू को एम्..ज़रूर करवाऊंगा, लेकिन मैं सोचता ही रह गया और राजू की नौकरी भी लग गईएक दिन मुझे उदास देख कर राजू ने कहा था , की "भइया, आप अपने बैंक ड्राफ्ट के लिए हमेशा चिंता करते रहते हो , बस छः महीने बाद मेरी पोस्टिंग हो जायेगी तब फ़िर तुम आराम से कितने भी आवेदन करते रहना.....पैसों की कोई चिंता नहीं..." मैं राजू का चेहरा देखता रह गयाहांलांकि उसने एकदम सरलता से ही ये कहा था, लेकिन मुझे लगा की कहाँ मैं इसे एम्..करवाने की बात करता था और अब यही मुझे आवेदन-पत्रों के लिए पैसे देगा!! यानी राजू को पूरा भरोसा था, की इन छः महीनों में उसके भइया की नौकरी कहीं भी नहीं लगने वालीऔर अब जब राजू तीन दिन बाद घर लौट रहा है, मैं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ,की उसके आते ही घर के सारे सदस्य मेरी उपेक्षा करते हुए जताएंगे की मैं बेरोजगार हूँनिश्चित रूप से मैं इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर सकतावैसे भी मैं राजू के सामने जाने में अजीब शर्म सी महसूस कर रहा था

ट्रेन लखस्टेशन पर आकर लग गई थीनीचे खड़े लोग तेज़ी से ऊपर आना चाह रहे थे , और अन्दर से उतरने वाले उन्हें धकियाते, झिडकते नीचे उतर रहे थेजल्दी से जल्दी स्टेशन से बाहर निकल घर पहुँचने को सबके बेताब कदमलेकिन मुझे कहीं जाने की जल्दी नहीं है

ट्रेन ने सरकते-सरकते फ़िर गति पकड़ ली है, और प्लेटफार्म छोड़ अपने गंतव्य को बढ़ गई है, लेकिन मैं अभी तक प्लेटफार्म पकड़े हूँ, क्योंकि मुझे तो अपना गंतव्य भी ज्ञात नहीं

8 टिप्‍पणियां:

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

मानव मन के अंतरद्वद का सटीक चित्रण

Vivek Rastogi ने कहा…

ऐसा मानसिक द्वंद सबके साथ कभी न कभी किसी न किसी रुप में होता ही है। जब ऐसा लगता है कि सारे रास्ते बंद हो गये हैं परंतु व्यक्ति को काम ढूँढ़ने या काम करने की आग को अपने अंदर बुझने नहीं देना चाहिये तभी वह तप के सोना बनता है और सबसे आगे पहुँच जाता है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद गगन जी,विवेक जी.

Udan Tashtari ने कहा…

कहानी पसंद आई. अक्सर लगातार मिलती असफलता से ऐसे मनोभाव हो जाते हैं कि लगने लगता है, सब कुछ मेरे विरोध में है. वही मानसिकता इस कथा के मुख्य पात्र के साथ हो गई है.

बढ़िया कहानी.

बधाई

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद समीर जी, कहानी पढने और उसे सराहने के लिये.

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

sachmuch zindagi ke rukh ka kuchh pata nahi ,admi kuchh sochta waqt kuchh ansocha kar deta hai. Kahani achchhi hai.Swagat....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सच है रामकुमार जी.ब्लौग पर आने के लिये धन्यवाद.

Nandini ने कहा…

रचना में मानसिक द्वंद का चित्रण सराहनीय है। ऐसा लगता है जैसे रचना कहानी के अंजाम तक नहीं पहुँच पायी। मैं तो लघुकथा से जुड़ा व्यक्ति हूँ,क्या आप अपने ब्लाग पर लघुकथाएँ पोस्ट करती हैं?
-श्याम सुन्दर अग्रवाल