शुक्रवार, 1 मई 2009

'हवा उद्दंड है'


"अन्नू..... उठ जाओ, छह बज गए हैं।"
मम्मी की आवाज़ के साथ ही मेरी आँखें खुल गई थीं। क्या मुसीबत है! ऐसे कडाके की ठण्ड में उठना होगा! यदि इस वक्त ज़रा भी आलस किया तो 'बस ' के समय तक तैयार होना बड़ा मुश्किल होगा। बस का ख्याल आते ही एक झटके से रजाई फ़ेंक उठ खड़ी हुई थी मैं। सर्दियों में तो सचमुच ही सुबह उठना बहुत अखरता है। भइया और गिन्नी मेरी छोटी बहन को सोते देख बड़ी ईर्ष्या होती है, उनसे। भइया तो वैसे भी धुरंधर सुबक्कड़ हैं। यदि उन्हें दस बजे ऑफिस न जाना हो, तो बारह बजे तक सोते ही रहें।
जब तक मुझे नौकरी नहीं मिली थी, सोचती थी की कितना शुभ दिन होगा, जब मुझे नौकरी मिलेगी! तब नौकरी के समानांतर चलने वाली अन्य समस्याओं पर गौर ही कहाँ किया था! उनकी जानकारी ही कहाँ थी मुझे!शुरू के दिनों में कैसे उत्साह से गई थी कॉलेज , और अब!!अब तो जाने के नाम से ही कांटे से उग आते हैं शरीर पर ।
जैसे-तैसे नाश्ता कर, बस-स्टॉप की ओर भागी थी। बस अभी आई नहीं थी। बस-स्टॉप पर एक विशालकाय इमली का पेड़ था, जिसकी छाया में हम रोज़ अप-डाउन वाले बस का इंतज़ार किया करते थे। लेकिन मुझे वहां खड़ा होना बड़ा अजीब लगता था। मेरा पूरा वक्त घड़ी देखते या फिर अपने बैग को दोनों हाथों में बारी-बारी से बदलते बीतता।
मुझे स्टॉप पर पहुंचे अभी दो मिनट ही हुए होंगे, की एक लड़का बड़ी तेज़ सायकलिंग करता हुआ मेरे बहुत करीब से गुज़र गया ; इतने करीब से की मैं चौंक कर दो कदम पीछे हट गई। यदि मैं पीछे न हटती तो निश्चित रूप से वह सायकिल मुझ से टकरा जाती। मेरे इस तरह पीछे हटने पर , थोडी ही दूरी पर खड़े तीन-चार लड़के हो-हो कर हंसने लगे। क्रोध और विवशता से बस होंठ भींच कर रह गई मैं।
आजकल के किशोरवय प्राप्त लडके इतने असभ्य और उद्दंड हो गए हैं की इनके लिए कुछ कहने को मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं.लगता है, आजकल की हवा ही उद्दंड हो गई है। जिस लड़के को छूती है, उसी के पर निकल आते हैं।
बस आ गई थी। भीड़ का रेला बस की ओर दौड़ पड़ा था। इस रेलमपेल में दबी हुई मैं भी किसी तरह बस में चढ़ने में सफल हो गई थी। सारी सीट्स भर चुकीं थीं । खड़े रहने के सिवा कोई चारा न था। आगे एक प्रौढ़ सज्जन खड़े थे, सो उसी जगह को उपयुक्त समझ कर मैंने भी अपने लिए वहीं जगह बना ली थी। एक झटके के साथ बस चल पड़ी थी। इस बस का टाइम ऐसा था की साइंस कॉलेज वाले अधिकतर लड़के-लड़कियां इसी बस से जाते थे। ड्राइवर जब ब्रेक लगाता तो कुछ इस तरह की बस को जोरदार झटका लगता , जिससे बस में खड़ा प्रत्येक व्यक्ति असंतुलन की अवस्था में आ जाता और इस समय पीछे खड़े लड़के मौके का फायदा उठाते हुए लड़कियों को अपने हाथ का सहारा दे लेते, जबकि आगे खड़े लड़कों पर लड़कियां ख़ुद ही जा गिरतीं। ड्राइवर को झटकेदार ब्रेक की ताकीद लड़कों की ही थी।
अचानक ही बस की रेलिंग पर कसे हुए अपने हाथ के ऊपर किसी दूसरे हाथ का स्पर्श पा मैंने देखा , तो उन्हीं प्रौढ़ सज्जन का हाथ था। वे पीछे खड़े किसी व्यक्ति से बातें कर रहे थे। उनका सर पीछे की ओर घूमा हुआ था। अनजाने में ही उनका हाथ आ गया होगा ऐसा सोचकर मैंने अहिस्ता से अपने हाथ को ज़रा आगे खिसका लिया था। लेकिन दो मिनट बाद ही उसी हाथ का स्पर्श मैंने फिर महसूस किया। पलट करब देखा ,तो वे सज्जन पूर्ववत बातें करने में मशगूल थे। हाथ हटाना चाहा तो उनके हाथ की पकड मजबूत हो गई, मेरे हाथ पर। घबरा के फिर उनकी ओर देखा तो उन्हें अपनी ओर घूरता पाया। एक जोरदार झटके के साथ मैंने अपना हाथ रेलिंग पर से हटा लिया, ये जानते हुए की हाथ हटाने से मैं ख़ुद असंतुलित हो जाउंगी। मैं उन तथाकथित 'सज्जन ' से कुछ भी कह कर बस में ख़ुद आकर्षण का केन्द्र नहीं बनना चाहती थी। लड़कियों की यही तो त्रासदी है की लोग उन्हीं से छेड़खानी करते हैं और फिर यदि इसे वे ज़ाहिर करती हैं तो लोग उन्हें ऐसी नज़रों से देखते हैं, जिन्हें झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है।
लेकिन इस व्यक्ति की हरकत पर मैं अचम्भित थी। कम से कम पचास वर्ष की उम्र तो होगी ही उनकी। फिर क्या किशोरवय के लिए की गई मेरी विवेचना ग़लत हो गई? किशोर होते लड़कों को तो उनका अपनी उम्र से होता नया-नया परिचय उद्दंड बना देता है, लेकिन इनके लिए क्या कहूं? ये तो वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हैं!इस प्रकार क्या ये कभी अपनी मेरी ही उम्र की बेटी को कहीं अकेली भेज पायेंगे? क्या ये अपनी उम्र के लोगों पर विश्वास कर पायेंगे? ऐसे 'सज्जनों' की हमारे यहाँ कमी नहीं है , जो लड़कियों के आत्मबल का शमन करते हैं।
मैं अपने कॉलेज की अनुशासन-प्रिय व्याख्याता,बस की भीड़ में इतनी निरीह, दब्बू हो जाती हूँ की बस के बाहर आकर समझ ही नहीं पाती की मैं इस तरह दोहरा व्यक्तित्व कैसे वहन करती हूँ। शायद उम्र पाने के बाद अपनी इस असहायावस्था से मुक्त हो सकूं।
उन 'सज्जन 'की हरकतों में कमी नही आई थी। वे निरंतर अपने कंधे का स्पर्श मेरे कंधे को दे रहे थे । और उन्हें एक झन्नाटेदार थप्पड मारने की मेरी इच्छा भी बलवती हो उठी थी। बस में भीड इतनी थी कि आगे भी नहीं जा सकती थी। तभी ज़रा आगे एक सीट खाली हुई, और वहां बैठी महिला ने मुझे बुला लिया। शुक्र है भगवान का, वरना थोडी ही देर में मै उस व्यक्ति को एक थप्पड रसीद कर ही देती। मेरा स्टॉप आ गया था। बड़ी राहत महसूस की थी मैंने।
बस के रुकते ही मैं अपने बैग को सम्हालती दरवाज़े की ओर बढी थी । आगे बैठे लडकों की नज़रें मैं अपने चेहरे पर स्पष्ट महसूस कर रहे थी. सिर नीचा किये मैं तेज़ी से नीचे उतर गई. दो कदम आगे बढने पर ही मुझे सुनाई दिया, कोई गा रहा था-" उमर है सतरह साल इतनी लम्बी चोटी है...." और मुझे खयाल आया कि आज देर हो जाने की वजह से मैने अपने लम्बे बालों की चोटी को नीचे से खुला ही छोड दिया था. मेरे हाथ यन्त्रवत चोटी लपेटने को उठे लेकिन नहीं अब और नहीं.... अब इस समय मैने उसे यों ही लहराने दिया, उद्दंड हवा के विरोध में.

26 टिप्‍पणियां:

mark rai ने कहा…

vandana jee bade bujurgon ko kam mat samajhiye...ye bhi mouke ke firaaque me lage rahte hai...sab to aisa nahi karte ..yah bhi person to person depend karta hai ....
waise aapne apni bhaawnaaon ko kaaphi achchhe dhang se prastut kiya hai....

ajay kumar jha ने कहा…

vandana jee, aaj jo kahaane aapne bayaan kee hai ye ek aisee kadwee sachchaai hai jo roj hee na jaane kitnee ladkiyon ko jhelnaa padta hai, marmsparshi kahaanee rahee,
likhtee rahein.......

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मार्क जी,अजय जी धन्यवाद. मैने खुद लम्बे समय तक बस का सफ़र कर अपनी पढाई पूरी की है, जिन अनुभवों से गुज़री, शायद वही तकलीफ़ मुखर हो गई.

श्यामल सुमन ने कहा…

अनुभव जनित सत्य। कहते हैं कि-

बद नजर उठने ही वाली थी किसी की जानिब।
अपनी बेटी का खयाल आया तो दिल काँप गया।

काश ऐसा हो पाता।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत खूब शेर कहा आपने. क्या बात है! ब्लौग पर आने के लिये धन्यवाद.

Syed Akbar ने कहा…

मेरा तो मानना है कि जब तक लड़कियां खुद दबी रहेंगी कोई भी उनका शोषण कर सकता है. लड़कियों को खुद मुखर होना पड़ेगा.


... अच्छा चित्रण

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

एकदम सही बात. गलत बात का विरोध ही समाधान है. कहानी का अन्त विरोध से ही है. बहुत-बहुत धन्यवाद.

ARUNA ने कहा…

वंदना जी आपने सची बात कही है, मैं भी गुज़र चुकी हूँ इस दौर से... समझ सकती हूँ कैसा लगता है! समस्या का समाधान अगर थपड है, तो मुझे नहीं लगता हमे पीछे हटना चाहिए...कम से कम ऐसे लोग अगली बार कुछ घिनौना
करने से पहले सोचेंगे तो!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

और ये बात हमें ही सिखानी भी है, उन लडकियों को जो हर बात को चुपचाप बर्दाश्त करते हुए अलत कामों को बढावा देतीं है. आप ने अपना वादा निभाया है, अरुणा जी, आभारी हूं.

Udan Tashtari ने कहा…

एकदम सही लिखा..लड़कियों को ही मुखर होना होगा..

Kishore choudhary ने कहा…

बंद घरों में रह रही लड़कियां भी कमोबेश ऐसे ही वातावरण का सामना कर रही हैं समय के साथ देहरी से बाहर काम काज में बराबर की भागीदार होने पर मुश्किलें वही है किन्तु छेड़ छाड़ करने वाले अब रिश्तेदारों की जगह अजनबी हो गए हैं, इनसे निपटना मुझे थोडा आसान लगता है, आपकी कहानी की पात्र एक सजीव माहौल में जी रही है, बस हैं तो धक्के भी हैं, भीड़ भी है तो कहीं अपने पास बुलाती आत्मीयता भी है.
बड़े सहज तरीके से रचना को पूर्ण किया है आपने, भाषा बांधे रखती है पाठक को. आखिर में कमाल किया है या शायद मुझे ही बहुत पसंद आया 'अब इस समय मैंने उसे यों ही लहराने दिया, उद्दंड हवा के विरोध में '

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद किशोर जी. इस कहानी का अन्त मुझे भी पसन्द है. मज़े की बात तो ये कि इस अन्त को डा.नामवर सिंह ने भी खूब पसंद किया. रचना की इतनी प्रशंसा, या कहूं समीक्षा के लिये एक बार फिर आभारी हूं.

अर्कजेश *Arkjesh* ने कहा…

विरोध न करने से इस तरह के छेडू और चिपकू लोगों को बढावा मिलता है | यह भी एक मनोवैज्ञानिक प्रश्न है कि अधेड़ उम्र के लोग इस तरह कि हरकतों में ज्यादा लिप्त क्यों होते हैं | यद्यपि बलात्कार, छेड़छाड़ और सार्वजनिक स्थानों पर भीड़-भाड़ का फायद उठाकर महिलाओं को परेशान करने का कारण, समाज के द्बारा दी गई दमित कामवासना है | सारी धार्मिक नैतिकताओं और शिक्षाओं, आधुनिकता के कथित दावों के बावजूद इस तरह की घटनाएँ आम हैं | इससे यह साबित होता है कि हमारे धर्म और नैतिकता कि शिक्षाओं में बुनियादी भूल है और वे जड़ से खोखली हैं |

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जी हां अर्कजेश जी. मध्यम वर्गीय परिवारों में,लडकियों का पालन-पोषण, और उन्हें हमेशा असुरक्षित साबित करते रहने की मानसिकता के चलते लड्कियां अपना आत्मविश्वास खो देतीं है, नतीज़तन विरोध की क्षमता विकसित ही नहीं हो पाती.आज भी बीस साल की बहन के साथ उसकी सुरक्षा(?) हेतु दस साल का भाई भेज दिया जाता है...

ज्योति सिंह ने कहा…

उदंडता को ख़त्म करना ही बेहतर है.
कहानी का अंत बहुत ही बेहतरीन है.

Rahul Singh ने कहा…

bahut achhe

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद ज्योति जी, राहुल जी.

रवीन्द्र दास ने कहा…

kavyatmak virodh. ek svabhavik si lagti kahani.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत-बहुत धन्यवाद रवीन्द्र जी.

vipin chaturvedi ने कहा…

vandanaa, tumhaari yeh kahanee maine parhee hai. Kab aur kahaan , yaad naheen. main aajkal kampootar par kam baith paataa hun.
Meri ek pustak haal men prakaashit huee hai. ( OOTAKI PARICHAY ) An introduction to Histology. U.P. Hindi sansthan ne kendriya Hindi nideshalaya ke sahyog se ise prakashit kiya hai. Medical vishay par hindi men yeh vishva vidyalaya star ki pahilee oustak maanee jaa rahe hai . tumhare soochanaarth aur daad chahte hue . VIPIN CHATURVEDI.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अरे वाह!! आपको ब्लौग पर देख कर कैसा लग रहा है, बता नहीं सकती. ये वही पुस्तक है न, जिस पर आप काम कर रहे थे? पुस्तक के प्रकाशन पर मेरी ढेर सारी बधाइयां.दाद भी दे सकती हूं, लेकिन फ़िर आप मुझे किताब दिखाने की कोशिश ही नहीं करेंगे.

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर कहानी।

बेनामी ने कहा…

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