शनिवार, 25 अप्रैल 2009

ईश्वर की इच्छा

हर अच्छे काम का श्रेय

लेते हम अपने सर,

और गलतियों को

मढ़ देते ईश्वर पर।

क्या करता है वह

हमेशा काम ग़लत?

तो फिर कोई

क्यों पूजे उसकी मूरत?

10 टिप्‍पणियां:

kanchan ने कहा…

waah .....satya kathan

Kapeesh gaur ने कहा…

ji bilkul sahi kaha aapne...

Kishore choudhary ने कहा…

सत्य वचन हम सब जगह अपनी सुविधा देखते हैं !!

ARUNA ने कहा…

hi vandana, mein kishore ji ke blog se yahan pe aayi hoon......aapne jo kaha bilkul sahi kaha!

mark rai ने कहा…

vandana jee yahi to duniya ki rit hai
jise aapne apni kavita me piroya hai

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

आप सब ने हमेशा की तरह मेरा मान बढाया है,धन्यवाद.अरुणा जी आप की आभारी हूं, आप ब्लौग पर आईं और टिप्पणी भी की.

Kanishka Kashyap ने कहा…

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Kanishka Kashyap

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वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

धन्यवाद कनिष्क जी.

RAJ SINH ने कहा…

इस लिये हैन पूजते नाकामियान उस्की रहेन
और मढ देन दोष सब उस्ने किया उसका किया.
पा गये उसका दिया कुछ तो बडे मगरूर बन
दर्प से सोचा किये मुझ्को मिला मैने किया !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर टिप्पणी कवित्त.धन्यवाद राज जी.