शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

तमन्ना..

हर तमन्ना
यहां पूरी नहीं होती,
ख्वाब जो देखा
उसकी तावीर नहीं होती।
करना है तसल्ली ,
बस इस ख़याल से;
खुदा होता है मगर उसकी
दीदारे-राह नहीं होती।

10 टिप्‍पणियां:

vidhu ने कहा…

badhiyaa hai....

वरुण झा ने कहा…

जो हमें आसानी से मिल जाती है, उसकी ज्यादा कद्र हम नही करतें है. शायद इसलिये ईश्वर हमें आसानी से नही मिलतें है.

ajay kumar jha ने कहा…

vandaja jee,
shubh sneh, chaliye ye andaaj bhee man ko pasand aayaa, aap bas likhtee jaayein, ham hain na padhne ke liye, bahut badhiyaa...

mark rai ने कहा…

हर तमन्ना
यहां पूरी नहीं होती,
ख्वाब जो देखा
उसकी तावीर नहीं होती.....nice post..
सूखे पत्ते कहाँ गए ? कुछ ख़बर नही । बचपन में बकरियों को खिलाते थे । जिनपर कभी लेटा करते थे । बागों से जिन्हें चुना करते थे ।
अब कहाँ गए होंगे ? कुछ समझ नही आता । बेचारे !
क्या सूखे पत्तों की भाँती हम भी एक दिन सुख जायेगे ? क्या हमारा भी वही हाल होगा ? क्या तब हमें कोई याद करेगा ?
कुछ समझ नही आता ।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

विधु जी, वरुण जी,अजय जी,मार्क जी, आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद.

Kishore choudhary ने कहा…

सुन्दर कविता , बहुत पसंद आई.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सोचती हैं जैसा

लिखती हैं वैसा

वंदना का यह रूप

बिल्‍कुल अपने जैसा।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अविनाश जी,किशोर जी, आप लोगों का यह स्नेहिल साथ हमेशा बना रहे, चाहूंगी कि ये तमन्ना ज़रूर पूरी हो.

Raju ने कहा…

मेरी कहानिया आप पोस्ट कर सकती हे
जो जिंदगी से भरपूर हे

मेरे ब्लॉग में आप का स्वागत हे

ब्लोग के जरिये आप जेसे दोस्तों मिले
अपने आप को खुशकिस्मत मानता हु
आपका email - id भेजे मेरा id
raju_1569@yahoo.com

लिखते रही ये गा

राजेश - http://raju1569.blogspot.com/

mahaboob aftab ने कहा…

बहुत सुन्दर........
मेरी हर तमन्ना , मेरी हर आरजू
तेरे नाम पे ख़त्म ,तेरे नाम से शुरू
हवा लाती है ,पैगाम तुम्हारी आमद का
फैल जाती है ,एक खुशबु चार सू