मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

चाह..........

"एक बार और जाल

फ़ेंक रे मछेरे,

जाने किस मछली में,

बंधन की चाह हो।"

(जब 18 साल की थी तब बुद्धिनाथ मिश्र आकाशवाणी छतरपुर की कौन्सर्ट में आए थे , उसी वक्त ये रचना उन्होंने सुनाई थी, तब से उनकी ज़बरदस्त प्रशंसक हूँ .)

7 टिप्‍पणियां:

अर्कजेश *Arkjesh* ने कहा…

बहुत गहरी बात कह दी, अनजाने में |
पोस्ट का शीर्षक तो लिखिए |

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

देखा अर्कजेश जी, आपने ध्यान दिलाया और मैंने तत्काल उसे पूरा किया...वैसे धन्यवाद तो ले लें.

Kishore choudhary ने कहा…

सच है याद आने लायक.
आकाशवाणी ने भारतीय सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर को अक्षुण रखने और उसके संरक्षण में खासा योगदान दिया है. छत्तरपुर कोई बहुत पुराना केंद्र नही है इसलिए लगता है आप अब भी उस रचना को फिर से प्राप्त कर कर सुन सकते हैं.

ajay kumar jha ने कहा…

baap re baap sirf chaar panktiyon mein itnee gehree baat, kya kahun , siwa iske ki lajawaab hai,

mark rai ने कहा…

aas tutani nahi chaahiye...kahi koi bandhan me aa sakta hai ..
waise mai sochta hoon ki is chhoti si rachna ke itane arth ho sakte hai ...samjhna mushkil hai ..chaliye ek do par hi dhyaan lagate hai ...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अजय जी,किशोर जी,मार्क जी हमेशा की तरह आप ने मेरा मान बढाया है.धन्यवाद.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।