मंगलवार, 13 जनवरी 2009

मेरी पसंदीदा....
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं,
रह्गुज़र घेरे हुए मुरदे खडे हैं बेशुमार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं
बोलना भी है मना, सच बोलना तो दरकिनार.
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-ज़ुर्म हैं,
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार.

4 टिप्‍पणियां:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं,
रह्गुज़र घेरे हुए मुरदे खडे हैं बेशुमार।
gahan abhivyakti...
zameer mar gaya ...insaan chalti phirti laash me tabdeel ho gaya....

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आपकी पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक ..अच्छी लगी रचना

Minakshi Pant ने कहा…

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-ज़ुर्म हैं,
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार.....
हम आपकी बात इस बात से बिल्कुल सहमत हैं दोस्त जी :)
सुन्दर रचना |