गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

अनिश्चितता में....

अनिश्चितता में....
ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से आ लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे की तरफ़ चल पड़ा। रिज़र्वेशन तो था नहीं सो जनरल डिब्बे में ही घुसना था, सो घुस गया. खड़े होने लायक जगह मिल गई थी। प्लेटफार्म पर अब वे ही लोग रह गए थे जो अपने मित्रों, या रिश्तेदारों को छोड़ने आए थे ,और अब ट्रेन के चलते ही हाथ हिलाने लगे थे। इस डिब्बे में केवल मैं ही ऐसा व्यक्ति था, जिसे कोई छोड़ने नहीं आया था। ऐसा नहीं है की मेरे घर में कोई है ही नहीं मां-पापा,दो भाई सब हैं,लेकिन इन सब के होते हुए भी मैं कितना अकेला हो गया हूँ। इसी अकेलेपन से बचने, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ मैं............

'भाई साहब आप चाहें तो यहाँ बैठ जाएँ, मैं अगले स्टेशन पर ही उतारूंगा...' कोई छोटा सा स्टेशन आने वाला था । पहली बार मेरी किस्मत ने साथ दिया था। ऐसी ठसाठस भरी ट्रेन में जगह मिल गई थी। आराम से बैठ कर एक मैगजीन के पन्ने पलटने लगा था। ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। मेरा घर , मेरा शहर बहुत पीछे छूट गया था।
पिछले कुछ महीनों में घर के माहौल में जो परिवर्तन आया था, वह निश्चित रूप से दुखदायी था। यह परिवर्तन भी तो अचानक ही आया था। और इसकी तह में राजू, मेरे छोटे भाई की नौकरी लग जाना था। राजू की बी.ई.की डिग्री रंग लाई थी, उसका सेलेक्शन शहर के ही एक प्रतिष्ठित संस्थान में हो गया था। राजू मुझसे दो साल छोटा है। पढने में तेज़ है, इसमें कोई शक नहीं , लेकिन मैं भी तो एम्.एस.सी करके बैठा हूँ, वो भी ७५% लाकर। ये अलग बात है, की अब इस तरह की डिग्रियों से कुछ होता नहीं। शायद इसीलिए पिछले दो सालों से बेकार बैठा हूँ। लगातार कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहता हूँ,लेकिन हासिल क्या होता है?मैं ख़ुद से परेशान हूँ। राजू को छः महीने की ट्रेनिंग पर बाहर जाना था बस उसके जाते ही घर के माहौल में जिस तेज़ी के साथ परिवर्तन हुआ, उसे देखते, मह्सूते हुए घर में रह पाना बड़ा मुश्किल था, मेरे लिए। अभी भी नौकरी का कोई ठीक-ठिकाना न होते हुए भी मैं लखनऊ जा रहा हूँ, अपने एक दोस्त के पास , जिसने अपने ऑफिस में कोई काम की बात कर के रखी है। कुछ भी मिलेगा, कम से कम अपने आवेदन पत्र तो ख़ुद के पैसों से खरीद सकूंगा।

अभी एक महीने पहले तो पापा ने साफ़-साफ़ कह दिया था। उस दिन पापा बड़े गुस्से में थे। कारण, बैंक का रिज़ल्ट आ गया था, और में उस में भी नहीं निकल सका था। दुनिया भर के सफल लड़कों के उदाहरण दे-दे कर डांटते रहे कितनी बातें सुनाई। गुस्से में उनके मुंह से निकल ही गया, "आख़िर कब तक खिलाऊंगा तुम लोगों को?" लोगों को? लोग अब थे ही कहाँ? राजू की नौकरी लग गई थी , छोटा भाई अभी पढ़ रहा था। यानि पापा अब सिर्फ़ मुझे ही खिलने में असमर्थ थे? मैं ही घर के लिए बोझ बन रहा था। उसी दिन मैंने सोच लिया था की अब पापा से पैसे नहीं मांगूगा कभी। और पड़ोस के एक लड़के को ट्यूशन पढ़ने लगा था। महीने के अंत में पाँच सौ रु.मिल गए थे मुझे।

वे मेरी भागदौड के प्रारम्भिक दिन थे जब मैं सोचता था की नौकरी लगते ही मैं राजू को एम्.ई.ज़रूर करवाऊंगा, लेकिन मैं सोचता ही रह गया और राजू की नौकरी भी लग गई। एक दिन मुझे उदास देख कर राजू ने कहा था , की "भइया, आप अपने बैंक ड्राफ्ट के लिए हमेशा चिंता करते रहते हो न, बस छः महीने बाद मेरी पोस्टिंग हो जायेगी तब फ़िर तुम आराम से कितने भी आवेदन करते रहना.....पैसों की कोई चिंता नहीं..." मैं राजू का चेहरा देखता रह गया। हांलांकि उसने एकदम सरलता से ही ये कहा था, लेकिन मुझे लगा की कहाँ मैं इसे एम्.ई.करवाने की बात करता था और अब यही मुझे आवेदन-पत्रों के लिए पैसे देगा!! यानी राजू को पूरा भरोसा था, की इन छः महीनों में उसके भइया की नौकरी कहीं भी नहीं लगने वाली। और अब जब राजू तीन दिन बाद घर लौट रहा है, मैं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ,की उसके आते ही घर के सारे सदस्य मेरी उपेक्षा करते हुए जताएंगे की मैं बेरोजगार हूँ। निश्चित रूप से मैं इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। वैसे भी मैं राजू के सामने जाने में अजीब शर्म सी महसूस कर रहा था।

ट्रेन लखनऊ स्टेशन पर आकर लग गई थी । नीचे खड़े लोग तेज़ी से ऊपर आना चाह रहे थे , और अन्दर से उतरने वाले उन्हें धकियाते, झिडकते नीचे उतर रहे थे। जल्दी से जल्दी स्टेशन से बाहर निकल घर पहुँचने को सबके बेताब कदम । लेकिन मुझे कहीं जाने की जल्दी नहीं है।

ट्रेन ने सरकते-सरकते फ़िर गति पकड़ ली है, और प्लेटफार्म छोड़ अपने गंतव्य को बढ़ गई है, लेकिन मैं अभी तक प्लेटफार्म पकड़े हूँ, क्योंकि मुझे तो अपना गंतव्य भी ज्ञात नहीं।

(कल आठ दिवसीय प्रवास पर कानपुर जा रही हूं, इस बीच मेरी ये पुरानी कहानी ही पढिये न, इसे पूर्व में बहुत कम पढा गया था, चाहती हूं कि इसे भी आप सब पढें और अपनी राय से अवगत करायें. मेरी इस धृष्ट्ता को माफ़ करेंगे न?)

शनिवार, 28 नवंबर 2009

दस्तक के बाद

साड़ियाँ
सारा कमरा बनारसी साड़ियों, सूट के कपड़ों, बच्चों के कपड़ों, शाल, स्वेटर और जेवरों से अटा पड़ा था.
बहुत प्यारी-प्यारी साड़ियाँ थी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी तो बहुत ही प्यारी थी. मनीष, निशि , रीना और सीमा इन चारों के ऊपर कपड़े खरीदने की ज़िम्मेदारी थी, जिसे इन लोगों ने बखूबी निभाया था.
' मम्मी- चलो सबको कपड़े दिखा दूं , और बाँट दूं '
यह जानने के लिए तो सभी उत्सुक थे, की कौन से कपड़े किसके हिस्से में आने वाले हैं. सो एक आवाज़ में ही सारे लोग कमरे में जमा हो गए थे.
"ऐ सीमा , ये नीले रंग की साड़ी तो बहुत प्यारी है, मैं तो यही लूंगी. मम्मी देखो ये पांच बनारसी और दो कांजीवरम साड़ियाँ शुची के लिए थी हैं न?"
"बहुत बढियां हैं. सुनील ने ही पसंद की है न ? बस शुची को भी पसंद आएगी."
" ये दो साड़ियाँ निशि के लिए और ये एक साड़ी और दो सूट के कपड़े रीना के लिए ये दो साड़ियाँ सीमा के लिए..............................
"ये कपड़े मेरे, ये सुनील के, ये के बच्चों के ..........."
साड़ियाँ तो सारी बँट गई मेरे लिए तो कोई साड़ी निकली ही नहीं. भूल गया है क्या मनीष? अरे हाँ अभी वो प्याजी रंग की साड़ी तो रखी है शायद वही मेरे लिए लाये होंगे ये लोग.
" मम्मी ये साड़ी तुम्हारी- रंग अच्छा है न , तुम्हारे लिहाज से तो ठीक ही है "
मनीष एक एकदम हलके क्रीम कलर की सिल्क की साड़ी मेरी तरफ बढ़ा रहा था और मैं? मैं न उसे ले पा रही थी और ना ही कुछ कह पा रही थी . मैं क्या इतनी बूढी हो गयी हूँ? क्या मैं अब कामदार साड़ियाँ पहनने के लायक नहीं रह गयी हूँ ? इन लोगों ने यह कैसे मान लिया की मेरी इच्छाएं मर गयी हैं जो कुछ ये पहना देंगे मैं पहन लूंगी? सीमा, निरीह भाव से मुझे देखने लगी थी.
" ये एक कांजीवरम साड़ी बच रही है.........
" अरे वाह ! बच रही है तो क्यों न मैं ही लेलूँ"
' निशि मैं सोच रही थी कि ये साड़ी भाभी के लिए ठीक रहेगी"
" मम्मी के लिए? अरे अब इस उम्र में मम्मी इसे क्या पहनेंगी? है न मम्मी?"
" हाँ तुम्ही ले लो."
कह दिया था मैंने लेकिन मन बेहद दुखी हो गया था . उम्र के साथ-साथ इच्छाएं भी मर जाती हैं ; ऐसा हमारे युवा होते बेटे, बेटियाँ, बहुएं क्यों सोचने लगते हैं? फिर मैं अभी पचपन की ही तो हूँ. फिर मुझे अच्छे अच्छे कपड़े, साड़ियाँ पहनने का शौक भी बहुत है. अनावश्यक श्रृंगार तो मुझे वैसे ही पसंद नहीं है. पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं हम लोगों के वैवाहिक जीवन को . मैं बीस की थी जब हमारी शादी हुई थी एक बेहद सौम्य , सरल और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अनिल मुझे मिले थे. बेहद प्यार करने वाले . मैं खूब सज-संवर के रहूँ, अनिल की यही इच्छा रहती थी. अब तो अनिल भी बेहद चुप-चुप से हो गए हैं. घर में जो कुछ हो रहा है उसे बस निर्लिप्त भाव से देखते रहते हैं.
मन कैसा अजीब सा हो गया था. अपने भीतर आंसुओं का सैलाब सा उमड़ता महसूस किया था मैंने. धत! कैसी पगली हूँ मैं! ठीक ही तो कहते हैं लड़के. भला अब इस उम्र में मैं कामदार साड़ियां पहनूंगी? सांत्वना दी थी मन को. अब जिनके साथ रहना है, उस नई पीढ़ी के साथ एडजस्ट करके ही चलना होगा, वर्ना उनका क्या है, मैं ही आंसू बहाती , मानसिक व्यथा लिए रहूंगी.
शाम को अनिल ने ऑफिस से लौटते ही मुझे आवाज़ दी थी.
"तुम्हारे लिए साड़ी लाया हूँ. वैसे मनीष तो ले ही आया होगा लेकिन ये मेरी तरफ से. शादी वाले दिन यही पहनोगी तुम."
बेहद प्यारी गुलाबी रंग की ज़री के काम वाली सिल्क साड़ी थी.
" लेकिन अब इस उम्र में ये साड़ी पहनते अच्छी लगूंगी क्या?"
"क्यों? इस उम्र से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम बूढी हो गई हो क्या? अरे तुम तो अपनी बहू से कहीं ज्यादा अच्छी लगती हो, अभी भी."
और दिन भर के जमा हुए आंसूं सारे बाँध तोड़ के बह निकले थे. अनिल की साड़ी को आँखों से लगा, फूट-फूट के रो पड़ी थी मैं. और अनिल पूरे वाकये से अनजान, परेशान , मेरे रोने से हतवाक खड़े थे. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की अचानक मुझे क्या हुआ? लेकिन मैं जानती थी की अब इस साड़ी को लेकर मेरा और अनिल का अच्छा ख़ासा मज़ाक बनाया जाएगा. " बुढापे का प्रेम" कह कर खिल्ली उड़ाई जायेगी. खुद हमारे बच्चे ही हमारा मज़ाक उड़ायेंगे.
जब तक ये तीनों होस्टल में रह कर पढ़ रहे थे, तब तक हम लोगों को अपनी उम्र का अहसास ही नहीं था. लेकिन अब कदम-कदम पर हमें उम्र का अहसास कराया जाता है.
घडी ने चार बजने का संकेत दिया था. अरे!! तो क्या सारी रात मैंने जागते हुए ही गुज़ार दी? मैं अपने प्रति ही ग्लानि से भर उठी थी. सच तो है. बुढ़ापा तो आ ही गया है मेरा. मैं महसूस नहीं कर पाती लेकिन देखने वाले तो महसूस करते हैं न. बच्चे मेरी उम्र के हिसाब से काम करते हैं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं अपनी उम्र को स्वीकार क्यों नहीं कर पाती? और सचमुच मन को बड़ी शान्ति मिली थी इस विचार मात्र से.
" मम्मी, कितनी देर से जगा रही हूँ. आठ बज रहे हैं. तुम्हारे बिना तो कुछ होने का नहीं. उठो न जल्दी."
रीना जगा रही थी. चाय पर सब मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सब मेरी और ऐसे क्यों देख रहे हैं? आज आठ बजे तक सोती रही तो जैसे कोई अनहोनी हो गई! सब तो रोज़ ही आठ बजे तक सोते हैं. मन फिर उदास हो गया था. आखिर ये सब मुझे समझते क्या हैं? इन सब के लिए मेरी हैसियत क्या है?
घर में शादी का माहौल था. वातावरण में खिलखिलाहटें और कहकहे घुले-मिले रहते थे. लेकिन मेरा मन खिन्नता से भरा रहता था. सबसे झल्ला के बोलती थी. हमेशा बडबडाती रहती थी. और शायद इन सभी के हंसी-ठहाकों के बीच मैं ही तनाव पैदा करती थी.
कल बारात जाने वाली थी. घर में बड़ा अच्छा लग रहा था. सुनील भी हल्दी लगाए पूरे घर में घूम रहा था. बहुत खुश था लड़का. आखिर शुचि से किया हुआ वायदा जो पूरा हो रहा था उसका. मैं भी खुश थी क्योंकि मैंने तय कर लिया था की मैं अनिल की लाई कामदार साड़ी ही पहनूंगी. चाहे कोई कुछ भी कहे.
बड़े जतन से अपने बालों में छिटकी चांदी को डाई करके काले बालों में मिलाया. चेहरे को मलाई से चमकाया. बारात उसी शहर में जानी थी सो सारे काम इत्मीनान से निपटा रही थी. ज़री से जगमग होती साड़ी पहनी. उसके साथ मैच करते आभूषण भी पहने. और अब बेहद खुश थी की मैं निशि से ज्यादा अच्छी लग रही हूँ. अनिल ने मुझे देखा, बोले कुछ नहीं( लो भला!! तारीफ़ तक नहीं कर सकते?) बच्चों ने भी कुछ नहीं कहा. न कहें. जलते हैं मुझसे. घर के अन्य मेहमान तो तारीफों का पुलिंदा बाँध रहे हैं न? यही काफी है. अपनी सज्जा के बल पर लगभग पांच वर्ष छुपा लिए थे मैंने अपनी उम्र के . और अब अपनी भावी समधिन , जिनकी सुन्दरता के बहुत कशीदे सुनील काढता रहता है, का मुकाबला करने को तैयार थी.
बारात
बारात शुचि के दरवाजे पर पहुँच गई थी. मेरी नज़रें बस शुचि की माँ को ही तलाश कर रही थीं. जो भी गहनों, जडाऊ साड़ी से लकदक महिला दिखती , तो मैं सोचती की यही है क्या शुचि की माँ?
" हम सब की और से ढेरों ढेर बधाईयाँ, शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये."
इस आवाज़ ने तन्द्रा भंग की थी मेरी.
अरे!!! यही है क्या शुचि की माँ? सिल्क की क्रीम, लाल बोर्डर की साड़ी पहने, माथे पर सिन्दूर की लाल बड़ी सी बिंदी लगाये, बालों को एक ढीले से जूड़े के रूप में लपेटे, सर पर पल्लू लिए हुए मेरे सामने एक बेहद सौम्य महिला खड़ी थी. मेरे दोनों हाथ अपने आप अभिवादन में जुड़ गए. उनहोंने बड़े प्यार से मेरे हाथों को थाम लिया था, और भीतर ले चलीं थीं.
उस सादगी भरे व्यक्तित्व में कैसा गज़ब का आकर्षण था! वहां ढेरों जडाऊ साड़ियों के बीच उनका सादा वस्त्रों में लिपटा मोहक व्यक्तित्व अलग ही दिपदिप कर रहा था. मेरे मुंह से शर्म के मारे शब्द ही नहीं निकल रहे थे. वे भी तो मेरी ही उम्र की हैं, लेकिन कितनी सरल, सौम्य और सादगी से भरपूर. एक मैं हूँ, जो अपनी उम्र को ताक पे रख के गहनों, साड़ियों के पीछे दौडती फिरती हूँ.
मेरे गहने मुझे काटने लगे थे. मेरी भारी साड़ी जो अभी तक अपने रेशमी अहसास से मुझे आनंदित कर रही थी, अब चुभने लगी थी. मुझे लग रहा था की मेरे सफ़ेद बाल जिन्हें मैंने बड़े जतन से काला किया है, अपनी पूर्णता के साथ झलकने लगें. मैं वही मनीष की लाई साड़ी पहन लूं.
सचमुच बच्चे सही मूल्यांकन करते हैं हमारा, हमारी उम्र का और उसके हिसाब से होने वाले प्रत्येक कार्य का. आज मुझे अपनी उम्र का भरपूर अहसास हुआ था. मैं खुद उसे महसूस करना चाहती थी आज, अभी, इसी वक्त.
मुझे लगा था की बुढ़ापा दस्तक देने लगा है. नहीं..........दस्तक देने के बाद आधा सफ़र भी तय कर चुका है..

रविवार, 8 नवंबर 2009

मेरी पसंद

निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफ़ी है,
हवा का रुख बदलने के लिये चाहत ही काफ़ी है.

ज़रूरत ही नहीं अहसास को अल्फ़ाज़ की कोई,
समुन्दर की तरह अहसास में शिद्दत ही काफ़ी है.

बडे हथियार लेकर लेकर जंग में शामिल हुए लोगों
बुराई से निपटने के लिये कुदरत ही काफ़ी है.

किसी दिलदार की दीवार किस्मत में नहीं तो क्या
ये छप्पर, झोपडे , खपरैल की यह छत ही काफ़ी है.

माधव कौशिक

( "अंगारों पर नंगे पांव" से साभार)

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

अहसास

"बडकी, टेबल पे नाश्ता तो लगा दो; बारात लौटने से पहले सब कम से कम नाश्ता ही कर लें....."

"बडकी ...... बड़ी जीजी को गरम पानी नहीं दिया क्या? कब नहायेंगीं ? बारात आने ही वाली है.........."

"बडकी....परछन का थाल तैयार किया या नहीं ?.....दुल्हन दरवाजे पर आ जायेगी तब करोगी क्या?"

बडकी -बडकी-बडकी............सबको बस एक ही नाम याद रहता है जैसे......... मेहमानों से ठसाठस भरे इस घर में काम की ज़िम्मेदारी केवल बडकी की...... मशीन बन गई है बडकी जब से छोटे देवर अभय की शादी तय हुई....


शादी भी ऐसे आनन-फानन की कुछ सोचने - प्लान करने का वक्त ही नहीं.... वैसे बडकी यानि बड़ी बहू अलका को कुछ प्लान करने का हक़ ही कहाँ है ? उसके हिस्से में तो केवल कर्तव्य ही आया है। छोटे घर की है न!! इन बड़े घर के लोगों के सामने कुछ भी बोलने का अधिकार है ही कहाँ उसके पास ? जब से आई है, तब से केवल हिदायतें ही तो मिल रहीं हैं । रस्मो-रिवाज़ सीखते -सीखते पाँच साल गुज़र गए....फिर भी अम्मा जी को लगता है किवह कुछ सीख ही नहीं पाई।

क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या बनाना है, कैसे बनाना है, सब अम्मा जी ही तो तय करतीं हैं । उसका अपना अस्तित्व तो जैसे कुछ रह ही नहीं गया ............. । यहाँ तक कि अपना नाम भी भूल गई है .........बस "बडकी" बन के रह गई है। .......भूल गई है कि कभी कॉलेज कीबेहतरीन छात्राओं में से एक गिनी जाती थी वह । भूल गई है, कि उसके सलीके, उसके पहनावे , उसके बातचीत के तरीके और उसकी बुद्धिमत्ता के कभी लोग.............. । उसके अपने घर में उसकी सलाह महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

लेकिन यहाँ ?? यहाँ तो उसे ख़ुद आर्श्चय होता है अपने आप पर। कैसा दब गया है उसका व्यक्तित्व! लगता जैसे नए सिरे से कोई मूर्ति गढ़ रहा है। ये वो अलका तो नहीं जिसका उदाहरण उसके शहर की अन्य माँएँ अपनी बेटियों को दिया करतीं थीं।

पाँच बरस हो गए अलका की शादी को , लेकिन आज भी नई-नवेली दुल्हन की तरह सर झुकाए सारे आदेश सर-माथे लेने पड़ते हैं। पाँच साल पहले की अलका कितनी खुशनुमा थी। एकदम ताज़ा हवा की तरह। उसकी खनकदार आवाज़ गूंजती रहती थी घर में। गुनगुनाते हुए हर काम करने की आदत थी उसकी। और इसी आदत पर बबाल हो गया यहाँ।

"घर की बड़ी बहू हो । ज़रा कायदे से रहना सीखो। क्या हर वक्त मुजरा करती रहती हो.... । "

मुज़रा !!! बाप रे!!!! सन्नाटे में आ गई थी अलका। नहीं। अब नहीं गाऊँगी। बस! तब से गुनगुनाना भी बंद।

अलका को चटख रंग कभी पसंद नहीं आते थे। एकदम हलके पर खिले खिले से रंग उसे खूब पसंद थे। ऐसे ही रंगों की बेहतरीन साडियां भी उसने खरीदीं थीं अपनी शादी के समय। तमाम रस्मों के दौरान भारी साडियां ही पहने रही थी, लेकिन तीन - चार दिन बाद थोड़ा हल्का महसूस करने के लिए अपनी पसंद की साड़ी पहनी और कमरे से बाहर आई तो अम्मा जी ने ऐसे घूरना शुरू किया जैसे पाता नहीं कितना बड़ा अपराध हो गया हो उससे। छूटते ही बोलीं-

" ये क्या मातमी कपड़े पहने हो ? हमारे यहाँ ऐसे कपड़े नई बहुएँ नहीं पहनती कोई देखे तो क्या कहे? जाओ। बदल कर आओ। अब यहाँ के हिसाब से रहना सीखो। "

तब से ले कर आज तक उन्हीं की पसंद की साडियां पहनती चली आ रही है।

सुबह की सब्जी शाम को भी खाई जाए अलका को ये बिल्कुल पसंद नहीं। फिर जिसे खाना हो खाए, अलका तो नहीं ही खायेगी। पूरे खाने का स्वाद ही ख़त्म हो जाता है जैसे .......................यहाँ अक्सर ही ऐसा होता है। सुबह दो सब्जियाँ बंबई जातीं ज़ाहिर है बच भी जायेगी। ऐसे में अपनी कटोरी में ज़रा सी सब्जी ले लेती अलका उसी में किसी प्रकार निगलती खाना.....इसी बात पर सुना एक दिन अम्मा जी कह रहीं हैं-

" इसे तो सब्जी खाने की आदत ही नहीं है। पता नहीं...... शायद मायके में सब्जी बनती ही न रही होगी इसी लिए सब्जी खाने की आदत ही नहीं है॥"

तब से रोज़ अनिच्छा से सही, बासी सब्जी खा रही है अलका....... ।

आधुनिकता का झूठा लबादा ओढे अलका की ससुराल में एलान हुआ था - ' हमारे यहाँ सब एक साथ खाना खाते हैं" अच्छा लगा था उसे। लेकिन जब खाना खाने बैठे तो बगल में बैठी अम्मा जी ने टोका-

" बडकी ज़रा पल्लू खींच लो। तुम्हारे बाल दिखाई दे रहे हैं। पल्लू माथे तक रहना चाहिए, बालों की झलक न मिले।"

मन बुझ गया था अलका का। पिता समान ससुर के सामने इतनी वर्जनाएं क्यों ? फिर अगर ऐसा ही है तो साथ में खाना खाने की ज़रूरत ही क्या है?
अलका के पति रवि सुदर्शन ; सुशिक्षित हैं लेकिन किसी बड़े नामचीन पद पर आसीन नहीं हैं। बस इसीलिए अलका भी घर में सम्मानित जगह नहीं पा सकती । छोटा देवर इंजीनियर है , साल में एक-दो बार आता है , अम्मा जी के लिए साड़ी और छिट-पुट सामान ले आता है चार दिन रहता है सो जी खोल कर खर्च करता है। इसीलिए बहुत अच्छा है। घर में उसकी इज्ज़त भी रवि से कई गुना ज़्यादा है।
इसी अभय की शादी हो रही है। बारात बस आती ही होगी। किन-किन ख्यालों ने घेर लिया था अलका को......... । सर झटक के उठ खड़ी हुई अलका।

" नानी बारात आ गई............"
"बुआ जल्दी चलो, नई दुल्हन आ गई है..........."
" अरे बडकी मामी, तुम भी चलो न!!......

तुम भी? मतलब चलो तो ठीक है नही चलो तो भी ठीक है ।
पर्दे पर तो कलाकार ही दिखते हैं ना,परदे के पीछे
उस दृश्य को तैयार करने में जुटने वाले लोग और उनकी मेहनत किसे दिखती है ? उनका तो कोई नाम भी नही जानता। ठीक यही हाल अलका का है। पूरी तैयारी उसी ने की है लेकिन कोई ये कहने वाला तक नही कि अलका ने बड़ी मेहनत की।
नई बहु का परछन हो रहा है,सास ने अपने गले की तीन तोले की चेन उतार कर बहु को पहना दी। एक -एक कर सारे रिश्तेदारों ने रस्म अदा की। बडकी के साथ भी ये ही सारी रस्में हुई थी लेकिन सास ने क्या दिया था? मुश्किल से चार ग्राम के कान के बुन्दे !!

खैर... अलका बहुत ज़्यादा नही सोचती इस बारे में । लेकिन सोचने की बात तो है न!!
" नई दुल्हन को बैठने तो दो........."

" हटो भीड़ मत लगाओ रे............"

" थोड़ा आराम कर ्लेने दो, फिर बात करना....."
किसी किसी प्रकार बच्चा पार्टी नई दुल्हन के पास से हटी।

घर में सुबह सबसे पहले उठने की जिम्मेदारी बडकी की ही है। उठकर किचन में सबके लिये चाय चढाना।
फ़िर सारे रिश्तेदारो तक पहुंचवाना भी एक बड़ा काम था। आज भी बडकी आदत के अनुसार छ्ह बजे उठकर नीचे उतर आई थी, उसने देखा, नई बहु का कमरा अभी बंद था। राहत की एक लम्बी सास ली उसने। पता नहीं क्यों उसे लग रहा था, कि यदि नई बहु उससे पहले उठ गई,तो उसे दिए जाने वाले तमाम,ताउम्र उदाहरणॊं में ये भी शामिल हो जायेगा। शादी के बाद उसे पहले ही दिन उठने में साढे छह बज गये थे, और तब से लेकर आज तक सैकडॊं बार उसे यह बात सुनाई जा चुकी है। उसकी नींद को लेकर फ़ब्ब्तियां कसी जाती रह्ती हैं। बस इसलिये नई दुल्हन का दरवाजा बंद देख उसे ऐसा लगा,जैसे कोइ बहुत बडा बोझा उसके सर से उतर गया हो।


टॆबल पर अम्मा जी और कुछ अन्य लोगों की चाय लगा दी थी बड्की ने। पौने सात बजे छोटी बहु किरन बाहर निकली। अपने नाइट गाउन के ऊपर ही दुपट्टा ओढ कर छोटी किचन में आई।

"हाय भाभी! गुड मोर्निंग। दो कप चाय मिलेगी क्या?"

बड्की ने तत्काल दो कप चाय ट्रे में रख दी। उसे लग रहा था, कि एक तो छोटी देर से उठी उस पर गाउन पहने ही बाहर चली आयी, और अब दो कप चाय लेकर वापस जा रही है। अम्मा जी से मिली भी नही, गाउन पहने है शायद इसलिये ........ ।

लेकिन ये क्या,सुना बड्की ने मगर कानों पर भरोसा नहीं हुआ। अम्मा जी भी कह रही थी छोटी से

" अरे छोटी इतनी जल्दी क्यों उठ गयी? जाओ थोडा और आराम कर लो। कोइ काम तो करना नही है---। "

हैं!! ये क्या वही अम्मा जी हैं?? अचम्भित है बड्की.... ।

न उसके बैठने पर कुछ कहा न उसके कपडो पर..... ।

अगले दो दिन फ़िर भारी व्यस्तता से भरे थे। रिसेप्शन के बाद मेहमानों की विदाई और घर व्यवस्थित करने में ही पांच दिन निकल गये। आज कुछ राहत मिली तो बड्की अपने कमरे में लेट गई। सोचा लंच में तो अभी देर है, थोडा आराम ही कर लूं। तभी जोर से खिलखिलाने की आवाज ने उसे चौका दिया-उठ कर देखा तो छोटी मेज पर खाना लगा रही थी, और चह्कते हुए पापा यानी ससुर जी को बता रही थी कि उसने क्या-क्या बनाया है। और सास जी? वो भी भाव-विभोर हो कर उसकी बातें सुन रही थी।

समझ में ही नही आया बड्की को ;क्या हो रहा है। ये दो तरह का व्यव्हार क्यों? उस पर इतनी पाबंदियां और छोटी पर??

शाम को फ़िर छोटी सास जी से जिद कर रही थी, बच्चों की तरह-

"चलिए मम्मी जी.... आइसक्रीम खाने चलेंगे........... । "

अलका की आखों में भय और अचरज का भाव देखकर तुरन्त अम्माजी बोलीं-" अरे छोटी है न...

इसलिये , अरे ओ अभय तू ही खिला ला आइसक्रीम। मैं तो न जा पाऊगीं"

रवि से कभी कहा उन्होनें, कि बड्की को आइसक्रीम खिला ला? उसे घूमना अच्छा नही लगता क्या?

और पूरे दस दिन बाद ही छोटी सूट पहनकर खडी थी, जिसे पहनने की हिम्मत अलका पांच सालों में भी नही कर पायी। और अम्मा भी
"हो गया छोटी है पहनने दो । बडॊ को शोभा नही देता सो तुम न पहनना बड्की। "

" बडो को? मैं कितनी बडी हूं, उससे केवल दो साल न?

छोटी ने तो रोज़ का रुटीन बना लिया था, घूमने का। सुबह भी कुछ बनाने का मन हुआ तो ठीक है नही तो नहीं। दोनों टाइम का खाना बड्की के सिर पर..... ।

कहीं भी जाना है तो इठलाकर पूछ्ती थी जाऊं न मम्मा??

और अम्माजी गद गद हो जाती। तुरन्त कह्ती-

" हां हां जाओ न। खाना बड्की बना लेगी। "

पता नही अम्मजी के जुबान पर किसने ताला डाल रखा था, अभय की नौकरी ने या दहेज में आये चार लाख रुपयों ने......... ।

लेकिन नही अब नहीं। अगर एक बहू के लिये अम्माजी इतनी दरियादिल और आधुनिक हो सकती हैं,तो उन्हें दूसरी के साथ भी यही रवैया अपनाना होगा। बस अब बहुत हुआ।

यदि रवि अपनी और अपनी पत्नी की स्थिती पर कुछ नही बोल सकते तो अब बड्की को ही आवाज उठानी होगी। अब कल से बड्की अपनी तरह से जियेगी। सबसे पहले उन संस्थानों में आवेदन करेगी जिन्हें उसकी ज़रूरत है।

कितना हल्का महसूस कर रही है बड्की...............

आज चैन की नींद सोयेगी अलका...... ।







शनिवार, 26 सितंबर 2009

ज्ञातव्य


"अरे वाह साहब! ऐसा कैसे हो सकता है भला!! इतनी रात तो आपको यहीं हो गई, और अब आप घर जाके खाना क्यों खायेंगे?"
’देखिये शर्मा जी, खाना तो घर में बना ही होगा। फिर वो बरबाद होगा।’
’लेकिन यहां भी तो खाना तैयार ही है। खाना तो अब आप यहीं खायेंगे।’
पापा पुरोहित जी को आग्रह्पूर्वक रोक रहे थे। हद करते हैं पापा! रात के दस बज रहे हैं, और अब यदि पुरोहित जी खाना खायेंगे तो नये सिरे से तैयारी नहीं करनी होगी? और फिर इतनी ठंड!! पता नहीं पापा क्यों मां से बिना पूछे ही क्यों लोगो को आये दिन खाने पर जबरन रोक लेते हैं! ये पुरोहित जी तो आये दिन! कहा नहीं कि जल्दी से खाने पर बैठ जाते हैं! अगर वे ही सख्ती से मना कर दें तो......
’राजू......ओ राजू........’
’ऐ राजू भैया, सो गये क्या?’
’हां’’अच्छा!! हां कह रहे हो और सो भी गये हो? पापा बुला रहे हैं, सुनाई नहीं दे रहा?’
’तुम सुन रही हो ना! तो बस तुम्हीं चली जाओ। मैं तो तंग आ गया पापा की इन आदतों से।’
सर्दियों में रज़ाई छोडना बडा कठिन काम होता है, शायद इसीलिये राजू भैया बिस्तर में घुसने के बाद अब उठना नहीं चाह रहे थे।
’ राजू..... अन्नू कोई सुन रहे हो.....?’
’ आई पापा........ ।’
आखिरकार उठना मुझे ही पडा था।
’अन्नू बेटा ज़रा जल्दी से पुरोहित अंकल के लिये खाना तो लगा दो।’
इतना गुस्सा आया था पुरोहित जी पर! मना करने के लिये मुंह में ज़ुबान ही नहीं है जैसे! लेकिन कर क्या सकती थी? बस मन में ही भुनभुनाती अंदर चली आई। मां रसोई में सब समेटने के बाद अब पापा के आदेश पर असमंजस में बैठी थी।इन पुरोहित जी के किस्मत तो देखो... केवल एक कटोरी पालक की सब्जी बची है! और कुछ भी नहीं! घर की बात हो तो अलग, अब किसी गैर को केवल पालक रोटी तो नहीं दी जा सकती न!! दही भी खत्म।
’मम्मा...जो है वही दे दो। कुछ बनाना मत।’
’ नहीं बेटा ऐसा खाना दूंगी तो अपनी ही तो नाक कटेगी। चार जगह कहते फिरेंगे......’
’मतलब बनाओगी?? तुम लोगों की इसी मेहमान नवाज़ी से तो......’पैर पटकती कमरे में आ गई।
’अन्नू, क्या आदेश हुआ पापा का?’
’होगा क्या? वही खाना खिलाओ।’
हमेशा ही ज्यों-ज्यों रात गहराती जाती है, त्यों-त्यों पापा का खाना खिलाने का विचार भी गहराता जाता है। सोचते नहीं कि बच्चों को दिक्कत होगी। अरे तुम्हें क्या हो गया? आंखे फाड-फाड के क्या देख रहे हो?’
’तुम्हारे वश का तो कुछ है नहीं, सिवाय चिडचिडाने के अच्छा हो कि तुम मम्मी की मदद करो।’
’तुम्हारे पापा भी हद करते हैं....’
मम्मी भी कमरे में आ गईं थीं।
’तो क्या हुआ मम्मा... पापा का होटल तो हमेशा ही खुला रहता है, तुम्हारे जैसा बिना मुंह का कुक जो है उनके पास।’
राजू भैया रज़ाई में घुसे-घुसे भाषण दे रहे थे। उनका क्या! ऐसे रज़ाई में घुस कर तो मैं भी बढिया भाषण दे सकती हूं। मेरी जगह रसोई में मम्मी के साथ काम करवायें तो जानूं! देर होती देख पापा भी अंदर आ गये थे-
’क्यों खाना नहीं है क्या?’
’ये अब पूछ रहे हैं आप? मान लीजिये खाना नहीं है, तब? किसी को ज़बर्दस्ती रोकने की क्या ज़रूरत है?’
’तुम लोग तो बस बहस करने लगते हो। मैं उन्हें ज़बर्दस्ती क्यों रोकूंगा भला? मैंने तो बस एक बार कहा था( वाह पापा!! क्या झूठ बोला है!)।
’चलो... अब मैं कुछ बनाती हूं।’
’अरे तुम कुछ बनाओ मत, जो है सो दे दो’
कह कर पापा फिर चले गये। मम्मी आटा गूंध रहीं थीं, मालूम है, पूडियां बनेंगीं इतनी रात को गरमागरम पूडियां खाने के बाद कोई क्यों ना रुके? ज़रूरत है तो बस रोकने की। एक बार ठंडा खाना परोस तो दें....लेकिन नहीं अपनी नाक बचाये रखने के लिये सब करना होगा। अभी सब्जी भी बनेगी....ये मम्मी-पापा भी ना! दिल खोल कर खर्च करेंगे, और फिर घर के बेहिसाब खर्चों के लिये रोयेंगे भी। जब देखो तब मेहमान-नवाज़ी.... आज वैसे भी महीने की पच्चीस तारीख है। महीने का अंत तो वैसे भी बहुत तंग होता है किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिये, जो शुद्ध वेतन में शाही तरीके से रहना चाहता हो। हमारा घर भी उन्हीं में शुमार है।ठंडे पानी से हाथ धोते ही सारा शरीर कांपने लगा था, मेरे हर एक कंपन में से पुरोहित जी के लिये चुनिंदा गालियां निकल रहीं थीं। आनन-फानन मम्मी ने शानदार डिनर तैयार कर दिया था। खाना खिलाते-खिलाते साढे ग्यारह हो गये थे।
अपनी पोजीशन बनाये रखने के लिये इस तरह खर्च करना मुझे और राजू भैया दोनों को ही सख्त नापसंद था। खर्च करते समय तो ये दोनों ही बिना सोचे-समझे खर्च करते हैं फिर बजट गडबडा जाने पर एक दूसरे को दोष देते हैं। खैर...... फिर भी घर की गाडी चलती रहती है। लेकिन इधर मैं और भैया दोनों ही पापा के खर्च करने के तरीके से नाखुश थे, लिहाजा पापा ने भैया को घर चलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी है। राजू भैया ने भी चैलेंज किया है कि वे इतने ही पैसों में बेहतर व्यवस्था करेंगे।बडी ज़िम्मेदारी थी....अब दिन के खाली समय में हम दोनों महीने के हिसाब का ही जोड बिठाते रहते।
’देख अन्नू, ये पापा की तनख्वाह के अट्ठारह हज़ार रुपये हैं.... और ये हैं दूध, बिजली, राशन सब्जी, फल, धोबी, पेपर, बाई, टेलीफोन के बिल.......’
’हूं.....’ मैं पत्रिका से सिर नहीं हटना चाह रही थी....
’ अब हिसाब की शुरुआत कैसे करें?’
’हूं......’
’क्या हूं-हूं लगा रखी है। मैं यहां सिर खपा रहा हूं और तुम..... चलो इधर।’
किसी प्रकार बजट बना। सारे खर्चे निकालने के बाद केवल दो हज़ार रुपये हमारी बचत में थे, जिनसे कोई भी फुटकर खर्च होना था।यानि हम लोगों का जेबखर्च नदारद!! दूसरे खर्चे ज़्यादा ज़रूरी हैं!!राजू भैया इस लम्बे-चौडे खर्चे को देख कर बडे दुखी थे।
’यार अन्नू ,मुझे तो कुछ रुपये चाहिये ही। एकदम खाली जेब कैसे रह सकता हूं?’
’तो तुम सौ रुपये ले लो। लेकिन तब सौ ही मैं भी लूंगी। मेरे खर्चे नहीं हैं क्या?’
उसी शाम भैया ने अपना फरमान ज़ारी किया था,खर्चों में कटौती बावत। नया बजट!एसा बजट तो वित्त-मंत्रालय भी पेश नहीं करता होगा! कोई उधारी नहीं...सब कैश पर। हर आदेश पर मम्मी-पापा ने सिर हिला के सहमति जताई। सारी कटौतियां शिरोधार्य कीं।महीना थोडी सी तंगी के साथ गुज़रा था। अब हमारे यहां आये दिन मिठाई-पार्टियां नहीं होती थीं। आने-जाने वालों को चाय-चिप्स में ही प्रसन्न होना पडता था। इससे हमें एक बडा फायदा ये हुआ कि केवल प्लेट से प्रेम रखने वालों का आना-जाना एकदम कम हो गया। पापा भी अब ज़रूरी होने पर ही लोगों को खाने पर रोकते थे, वो भी हमलोगों को बताकर। लेकिन खर्च हमारे पास आ जाने के कारण हम लोगों की हालत खस्ता हो गई थी। कारण? अब हम किसी भी चीज़ की ज़िद कर ही नहीं सकते थे!! पूरा खर्च हमारे पास था। यदि कहते भी तो पापा बडे आराम से कह देते पैसे तो तुम्हारे पास ही हैं, जो चाहो ले लो। लेकिन बजट था कि कुछ अतिरिक्त खर्च की अनुमति ही नहीं देता था। इसी बीच राजू भैया का एम।ई। के लिये सेलेक्शन हो गया। बहुत खुश थे भैया।
दो साल बाद शानदार नौकरी..... पापा-मम्मी ने उनसे नये कपडे बनवा लेने को कहा था। चलो इसी बहाने मेरा भी एक सूट तो बन ही जायेगा...राजू भैया अपना सामान लगा रहे थे, और मैं सोच रही थी कि कल उन्हें जाना है और अभी तक वे नये कपडे तो लाये ही नहीं। तभी उन्होंने मदद के लिये मुझे बुलाया- दौड के पहुंची, देख कर दंग रह गई कि कहीं भी जाने से पहले हमेशा नये कपडे खरीदने वाले राजू भैया, आज सारे पुराने कपडे खुद से प्रेस करके लगा रहे हैं।
’भैया नये कपडे क्यों नहीं लाये?
’नहीं यार! अभी ज़रूरत ही नहीं थी। ’
क्या कह रहे हो भैया? तुम और ये पुराने कपडे???
’ अन्नू, हम लोग कर्ज़ से लदे रहने के लिये हमेशा मम्मी-पापा को दोष देते थे, अपने आपको, अपनी आदतों को देखते तक नहीं थे। अपनी इस तनख्वाह में पापा घर चलाते या हमारी बडी-बडी फ़रमाइशे पूरी करते! उधार कपडे और अन्य सामान शायद वे इसीलिये लेते थे ताकि हमारी ज़रूरतें पूरी होती रहें। हमलोगों को अपनी चादर की लम्बाई तो अब मालूम हुई है,जबकि खुद ओढ कर देखी। और पहली बार मैने जाना कि राजू भैया इतने गंभीर भी हो सकते हैं। शायद बडे हो गये हैं।
(आज फ़िर अपनी एक पुरानी कहानी ही पढ़ने को दे रही हूँ.....क्षमायाचना सहित उनसे जिन्होंने इसे पहले पढ़ा है....जल्द ही नई कहानी पोस्ट करने का वायदा ...)

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

अलग-अलग दायरे..

"हल्लो नीरू "
'अरे !तुम आ गईं!.... आओ-आओ' मैं हाथ की झाडू वहीं छोड़ खड़ी हो गई थी, शर्म से पानी-पानी।
'तुम काम कर रहीं थीं, मैंने डिस्टर्ब कर दिया न,जल्दी आ के?'
'नहीं यार....वो तो आज इतवार है न, बस इसीलिए सफाई का काम देर तक चलता रहता है। अरे बैठो न!
राजी अपनी आदत के अनुसार धम्म से सोफे पर गिर गई,लेकिन इस धम्म के साथ ही एक जोरदार खटका भी हुआ, और मैं दरवाजे से बाहर देखने लगी। जानती थी,की राजी के ज़ोर से बैठने के कारण ,सोफे में मैंने जो अभी-अभी लकडी की तख्ती जोड़ी थी , निकल गई है।
'तुम बैठो, मैं ये कचरा निकाल के आती हूँ।'
और मैं जल्दी-जल्दी कचरा समेटने लगी। ये राजी भी तो समय से एक घंटा पहले ही आ गई है। वरना इस एक घंटे में तो मैं सफाई कर लेती, बच्चों को तैयार कर देती। अब पता नहीं कहाँ गंदे से खेल रहे होंगे!खैर अब जो होगा देखा जाएगा। हाथ धोकर मैं फिर से ड्राइंग रूम (?) में आ गई थी।
'नीरू डियर , पता नहीं तुम इतना सब कैसे कर लेती हो! मेरी तो सच्ची, बिल्कुल आदत ही नहीं है। ज़रा सा कुछ करना पड़ जाए तो बेहद थक जाती हूँ।'
'यहाँ तो मैं अकेली हूँ न, बस इसीलिए आदत सी पड़ गई है, हमारी बाई भी तो कल ही छुट्टी लेकर गई है।'
कहते-कहते हिचक सी गई थी मैं...लगा की राजी सब समझ रही है, की हमारे यहाँ बाई थी ही कहाँ !
'मम्मी-मम्मी.....देखो, मीतु ने मेरे ऊपर मिटटी डाल दी.....'
'मम्मी गीतू ने पहले डाली थी....'
गीतू-मीतु एक दूसरे की शिकायत लिए, सर से पैर तक मिटटी में नहाये हुए ड्राइंग रूम में खड़े थे। मेरे तो आंसू ही आ गए। इससे लाख दर्जे साफ -सुथरे तो रोज़ रहते हैं।
'राजी, ज़रा इनके कपड़े बदल दूँ, अभी आई। '
अन्दर आकर में बच्चों के कपड़े बदलने लगी थी।
'मम्मी, हम लोग कहीं जा रहे हैं क्या?'
'नही तो...'
'फ़िर ये नए वाले कपड़े क्यों पहना रही हो?'
उफ़!!!
सारी इज्ज़त धुलवा कर ही दम लेंगे ये बच्चे!! लेकिन वे भी क्या करें, आश्चर्य तो उन्हें होगा ही, मैं उन्हें वे कपड़े घर में पहनने ही कहाँ देती थी। जैसे-तैसे इशारे से उन्हें समझाया की चुप रहें।
ड्राइंग-रूम में आते ही राजी ने पूछा-'सुनील नहीं दिखाई दे रहे...'
'पता नहीं कहाँ निकाल गए॥'(बाज़ार गए हैं, कुछ नाश्ता लेने, मुझे अच्छी तरह पता है) ये सुनील भी तो बस! सुबह से कह रही थी की कुछ मिठाई वगैरह ले आयें.....अब इस राजी के सामने ही आयेंगे।
'तुम्हारा घर छोटा है, पर सुंदर है। तुम साफ भी तो खूब रखती हो।' 'चर्र......................''अरे क्या हुआ??''कुछ नहीं, तुम्हारे सोफे की कोई कील निकली थी शायद...साड़ी फंस गई है मेरी॥'
'रुको मैं निकाल देती हूँ...' कहती हुई मैं सोफे के पाए की कील में फँसी राजी की साड़ी निकालने के लिए झुकी। लेकिन हाय री किस्मत!!! मेरे ज़रा झुकते ही मेरी साड़ी का पल्लू लटक आया,और यत्न से छुपाई गई सीवन साफ़ दिखाई देने लगी।
ये राजी भी तो.....इतनी जल्दी आने की क्या ज़रूरत थी? साड़ी भी तो नहीं बदल पाई मैं॥
'तुम्हारी साड़ी फट गई है, लाओ मैं सिल देती हूँ....'
'अरे नहीं यार..... वैसे भी मैं इसे कई बार पहन चुकी हूँ, इसके रिटायरमेंट के दिन हैं....'
(इतनी अच्छी साड़ी... और इसका रिटायरमेंट!!)
'पापा आ गए....पापा आ गए.....'
सुनील आ गए थे,पुराना लंबा थैला साइकल पर लटकाए हुए। राजी की निगाह थैले पर ही अटकी रह गई थी। और मुझे भी सुनील नहीं थैला ही दिखाई दे रहा था। मुस्कुराते हुए सुनील थैले सहित ड्राइंग-रूम में आ गए। राजी के नमस्कार का उत्तर दे, मुझे आंखों ही आंखों में चिढाते से सुनील अन्दर चले गए। मैं तिलमिला के रह गई थी। मेरे अन्दर की हलचल मेरे चेहरे पर भी आ गई थी शायद,राजी ने पूछ ही लिया,' क्या बात है, परेशान लग रही हो?'
'अरे नहीं यार, मैं भी कैसी भुल्लकड़ हूँ, तुम्हें आए इतनी देर हो गई और मैंने पानी तक को नहीं पूछा! अभी आई'
सुनील आराम से अन्दर बैठे थे। गुस्से के मारे मैंने उनकी तरफ देखा तक नहीं, लेकिन सुनील भी कम नहीं हैं, दूसरी बार मेरे वहाँ से निकलते ही इतनी ज़ोर से चोटी खीची की ढेर सारा पानी ट्रे में गिर गया। इनका बचपना अभी तक गया नहीं। कोई गुस्सा हो भी तो कैसे? चाय बनाने अन्दर आई तो पीछे से राजी की आवाज़ आई-
'मैं अन्दर आ सकती हूँ नीरू?'
'हाँ-हाँ क्यों नहीं........'कहते-कहते मैंने एक नज़र बेड पर डाली, और अपने मम्मी-पापा को ढेर सा शुक्रियादा किया जिन्होंने ये सारा सामान मुझे दिया था,वरना सुनील की तनख्वाह में तो महीने के आखिरी दिन जैसे-तैसे ही कटते हैं...
सुनील के लाये हुए नाश्ते को प्लेट में लगा के लाई , तभी पता नहीं कहाँ से दोनों बच्चे भी प्रकट हो गए। और बेड से लग कर खड़े हो गए। अब तो कोई इशारा भी नहीं कर सकती थी मैं।
'आओ-आओ मीतू, गीतू तुम भी खाओ।'
दोनों मेरी ओर देखने लगे मेरे लेलो-ले लो कहते ही दोनों मिठाई की प्लेट पर टूट पड़े। उफ़!! कितने गंवार हैं दोनों!किसी प्रकार उन्हें बाहर भेजा तो जाते-जाते मीतू ने अपने धक्के से टेबल पर रखा पानी का गिलास ही गिरा दिया।पूरे कमरे में पानी फैल गया,और गीतू ने जाते-जाते नमकीन की प्लेट से ऐसा मुट्ठा भरा,की बेड रूम से लेकर बाहर तक नमकीन का रास्ता ही बनाती गई।
'अच्छा नीरू, अब मैं चलूँ.... आज मार्केट भी जाना है'
राजी को उसकी गाडी तक छोड़ आई थी। अबतक घटी सारी बातें सोच-सोच कर मुझे रोना आ रहा था।
'नीरू जल्दी खाना लगाओ यार, तुम्हारी सहेली ने तो भूखा मार दिया'
'आज तो हद ही कर दी तुम लोगों ने। सारी गरीबी उसे ही दिखानी थी?ये बच्चे भी बस!!नाश्ता देखते ही ऐसे टूट पड़े जैसे कभी खाने को ही न मिलता हो।'
'ठीक भी तो है नीरू। हमारे बच्चे कब-कब मिठाई खाते हैं?बच्चों को दोष देना एकदम ग़लत है। दरअसल सच तो ये है की सभी व्यक्ति अपने तबके के लोगों में ही घुल-मिल पाते हैं। मित्रता उनके बीच ही कायम रह सकती है, जिनमें बनावट नहो, दिखावा नहो। और एक दूसरे को समझने की क्षमता हो।'उपदेश देकर सुनील बाहर चले गए थे। और मैं बैठी-बैठी सोच रही थी, की अब इस बिखरे हुए घर को सहेजने में कम से कम एक घंटा तो लगेगा ही।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

आस-पास बिखरे लोग...

"क्या हुआ?”
"पता नहीं"
"तो फिर आप यहां क्या कर रहे हैं?"
"जो आप कर रहे हैं"

नीली कमीज़ वाले के पूछने पर सफेद कमीज़ वाले ने बेहद रूखा पर मुंहतोड जवाब दिया था। चौराहे पर भीड दोगुनी हो गई थी। लोग अलग-अलग टोलियां बनाये खडे थे। नीली कमीज़ वाले की जिज्ञासा अभी तक शांत नहीं हुई थी,सो वह कभी इस टोली कभी उस टोली में खडा हो, घटना को समझने की कोशिश कर रहा था। और अब जाके ,इतनी देर बाद उसे समझ आया कि सामने वाले घर में बहू जल मरी या मार दी गई।

’अरे साहब!घर के लोगों ने खुद ही जला दिया, और अब नाटक फैला रहे हैंकि बहू खुद ही जल मरी।’’
"ये तो बडी बुरी बात है। यहां इतनी बडी दुर्घटना हो गई और आप सब खडे-खडे तमाशा देख रहे हैं।’ नीली कमीज़ वाला अपनी पेंट ऊपर चढाते हुए बोला।

’हम सब तो तमाशा देख रहे हैं,आप ही कुछ क्यों नहीं करते?’’
"मुझे तो पूरी घटना ही नहीं मालूम थी।’
’अब तो मालूम हो गई? अब कुछ करिये।’
’अरे नहीं साहब, ये विवाद का वक्त नहीं है। इस केस पर विचार करना चाहिये। ’
बात बिगडती देख नीली कमीज़ वाला खिसिया कर फिर अपनी पेंट ऊपर चढाने लगा।
’पहले अपनी पेंट तो सम्भाल लो, फिर केस सम्भालना।’
ज़ोरदार ठहाका हवा में तैर गया। नीली कमीज़ वाला वहां से खिसक गया था।
’यार वो वाली फिल्म देखी उसमें भी सास बहू को बडा दुख देती थी।’
’मैं तो ऐसी रोनी फिल्में देखता ही नहीं। क्या फ़ायदा?’
’और कौंमेडी फ़िल्म्स देखने से फ़ायदा है?’
नीली कमीज़ वाला था। लेकिन उसके सवाल का जवाब देना किसी ने ज़रूरी नहीं समझा।
’ देख यार वो गुलाबी सूट वाली लडकी.....’
’हां यार.......बडी सुन्दर है..... चल॥ उसके पास से निकलते हैं॥’
’जनाब ये तो ठीक बात नहीं...पहली बात तो यहां बहू जला दी गई, दूसरी ये कि आपलोग मामले की गंभीरता को समझने की बजाय लड्की को छेडने का प्लान बना रहे हैं...कोई आपकी बहन को ऐसा ही कहे तो?’

’कौन स्साला मेरी बहन तक पहुंच रहा है? "

लडके ने पलटकर देखा तो नीली कमीज़ वाला अपनी बात कहने के बाद अब उसकी गंभीरता समझ रहा था, दूसरे लडके बीच-बचाव ना करते तो शायद बुरी तरह पिट जाता नीली कमीज़ वाला।
सामने वाले घर से ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ें आने लगीं थीं, पुलिस के दो सिपाही आ रहे थे, शायद इसीलिये। भीड फिर तितर-बितर हो गई थी। लोगबाग सिपाहियों के पीछे-पीछे उस घर की बाउन्ड्री में घुस गये थे। बाकी तमाशबीन घर के बाहर ही भीड लगाके खडे थे। चौरहे पर अब इक्के-दुक्के लोग ही घूम रहे थे।

’बडा बुरा हुआ साहब! और लोगों को तो देखो, कुछ करते ही नहीं।
’अरे श्रीमान जी यदि मैं इस मोहल्ले में रहता होता, तो इन लोगों को बचने न देता। पता नहीं इस मोहल्ले के लोग कैसे डरपोक हैं...कैसे सब देख-सुन रहे हैं, और चुप हैं।’
’लो भला!! देख तो आपके साथ ही रहे हैं। जितना आपको मालूम है, उतना ही हमें भी... घटना कोई सबके सामने तो हुई नहीं॥ कयास हैं केवल....’

’घटना का पता कैसे लगा? मतलब कब हुई...??मुझे तो कुछ खास नहीं मालूम, लेकिन जब शोर उठा उस वक्त मैं यहीं अपने घर के बाहर ही था। सामने वाले घर में तेज़ रेडियो बज रहा था।रोने की आवाज़ें सुनाई दीं, तो उसी घर के छुटके बच्चे से जो बाहर ही था, पूछा तो बोला कि छोटी भाभी जल के मर गईं। कमरे में बंद हैं। मेरे पूछने पर कि कब से बंद हैं, बोला दस-पन्द्रह मिनट से। अब साहब! दस-पन्द्रह मिनट में तो आदमी पूरी तरह जल भी नहीं पायेगा, उन्होंने मरा हुआ कैसे डिक्लेयर कर दिया?’
’अरे वाह!! भई कमाल की जानकारी है आपके पास तो!!!’

बताने वाला घबरा गया था।दोनों सिपाही बाहर आ गये थे, और अब मोहल्ले वालों से पूछताछ कर रहे थे।
’क्यों भैये...तुमने लडकी के रोने-चिल्लाने की आवाज़ें तो सुनीं होंगीं?’
’ऐं.....कहां....मैं तो आज उठा ही बहुत देर से हूं।’
’क्यों भाई साहब, आप तो ऊपर ही रहते हैं, आप ने तो ज़रूर सुनी होंगीं।"
’मैं.........मैंने कहां सुनी........मैं तो अभी-अभी बाहर से लौटा हूं।’
’श्रीमान जी, आप को तो बडी अच्छी जानकारी है, आप ही उन पुलिस वालों को कुछ क्यों नहीं बताते?’
’मैं?? अरे सब सुना-सुनाया है, मैने कुछ देखा थोडे ही है...’

और वे वहां से खिसक गये थे। और अब धीरे-धीरे सारे लोग खिसकने लगे थे। पता नहीं कब कौन पुलिस की चपेट में आ जाये......!!! पुलिस वाले भी खानापूर्ती के लिये ऊट्पटांग बयान दर्ज़ कर वापस चले गये थे। पोस्ट्मार्टम हुआ, रिपोर्ट आत्महत्या सिद्ध कर रही थी। और लोग अपने-अपने घरों में ज़ोर-शोर से कहते नज़र आ रहे थे कि ये हत्या है, लेकिन बाहर किसी के पूछने पर तत्काल अपनी बात से मुकर जाते, पुलिसिया झंझटों से बचने के लिये।और एक महत्वपूर्ण केस दब गया था, उचित जानकारी के अभाव में.....।

बुधवार, 12 अगस्त 2009

इस्मत जैदी की गजल



  • मैं जा रहा हूँ मेरा इंतज़ार मत करना ,
    और अपनी आंखों को भी अश्कबार मत करना ।


  • ग़रीब दोस्त हूँ कर पाउँगा नहीं पूरी ,
    के ख्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना।


  • ये जानता हूँ के तखरीब तेरी आदत है,
    हरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करना ।


  • मुझे तो मेरे बुजुर्गों ने ये सिखाया है,
    के दुश्मनों पे भी तुम छुप के वार मत करना।


  • मेरी हलाल की रोज़ी मुझे सुकूँ देगी,
    इनायतों से मुझे ज़ेर बार मत करना।


  • क़दम तुम्हारा सियासत में गर जमे, न जमे,
    ज़मीर अपना मगर दाग़ दार मत करना।


  • जो वालेदैन ने अब तक तुम्हें सिखाया है ,
    अमल करो न करो शर्मसार मत करना ।


  • सड़क भी देंगे वो पानी भी और उजाला भी,
    सुनहरे वादे हैं बस ऐतबार मत करना।


  • जो सच है जान लो फिर कोई फ़ैसला देना
    बिना पे शक की कभी इश्तहार मत करना ।


  • (यह ग़ज़ल मेरी परम मित्र इस्मत जैदी की है। ख़ास बात यह है कि लंबे समय तक इस्मत केवल गद्य की विधा में ही लिखती रहीं। तमाम आलेख और कहानियां उनके नाम पर दर्ज हैं। लेकिन इधर कुछ समय से उन्होंने पद्य की विधा में लिखना शुरू किया है और माशा अल्लाह क्या खूब किया है। )

    बुधवार, 8 जुलाई 2009

    बड़ी हो गई हैं ममता जी....

    दुलहिन ओ दुलहिन ..............देखना ज़रा , मटके वाली निकली है क्या ?"
    अम्मां जी का ध्यान पूजा से हट कर मटके वाली की आवाज़ पर चला गया था, और आदतन उनकी जुबां "दुलहिन -दुलहिन " पुकारने लगी थी .
    बस यही आदत ममता जी को बिल्कुल पसंद नहीं . अब पूजा करने बैठीं हैं तो पूरे मन से भगवान को याद कर लें . भगवान का भजन कर रहीं हैं ; माला फेर रहीं हैं , लेकिन कान और ध्यान गली में है . अस्सी पार कर चुकीं है , लेकिन घर -गृहस्थी से मोह-भंग अभी तक नहीं हुआ। पूरे दिन ........दुल्हिन ये कर लो दुल्हिन वो कर लो.... उफ़!! तंग हो जाती हैं ममता जी। आख़िर उनकी उम्र भी तो अब लड़कपन वाली नहीं रही। तीन-तीन युवा बेटे-बेटियों की माँ हैं, लेकिन अम्मा जी अभी तक नई नवेली दुल्हन की तरह नचाये रहती हैं। उनकी जुबान पर बस दो ही नाम रहते हैं , एक तो भगवान का दूसरा ममता जी का।
    वैसे अम्मा जी भी क्या करें, ले दे कर इकलौती बहू हैं हैं ममता जी। अपनी सारी इच्छाएं, सारे शौक अपनी इस इकलौती बहू में ही तो साकार करती आईं हैं वे। और ममता जी भी बस! अम्मा की आवाजों पर चाहे कितना भी क्यों न झल्लाएं, लेकिन उनका हर काम अम्मा जी से पूछ कर ही होता है। सब्जी क्या बनेगी? मठरी में मोयन कितना देना है? सब अम्मा जी ही बताती हैं। जबकि तीस वर्ष पुरानी दुल्हन पचास वर्षीया ममता जी के हाथ अब अम्मा जी की विधियों के अनुसार ही अभ्यस्त हो चुके हैं। लेकिन तब भी ममता जी की पूछने की और अम्मा जी की बताने की आदत सी हो गई है।
    रोज़मर्रा की साधारण सी सब्जी भी बनानी होगी, तो अम्मा जी विधि बताना शुरू कर देंगीं। और झल्लाती हुई ममता जी का बडबडाना शुरू हो जाएगा- " अरे आता है मुझे, सब्जी बनाना। बुढापा आ गया है मेरा! ........................लेकिन रोज़-रोज़ सब्जी की वही विधि बताने का सिलसिला ख़त्म नहीं कर पा रहीं अम्मा जी। रट गईं हैं सारी विधियां " लेकिन इस बड़बड़ाहट का स्वर बस उतना ही ऊंचा होता जितना उन्हें स्वयं सुनाई दे . इसीलिये तो पिछले तीस सालों से अम्मा जी का विधि बताना और ममता जी का बडबडाना एक साथ जारी है . अम्मा जी के सामने ममता जी ने उनका कभी विरोध नहीं किया। कोई भी पकवान भले ही ममता जी अपनी विधि से बनाएं लेकिन उसकी भी विधि अम्मा से पूछना और फिर उस विधि को पूरा सुनना शायद ममता द्वारा अम्मा जी के प्रति सम्मान प्रकट करने का ही एक तरीका है।

    पचास वर्शेया ममता जी पूरे दिन अम्मा की आवाज़ पर यहाँ-वहां होतीं रहतीं हैं। खीजती भी रहतीं हैं, लेकिन अम्मा का "दुल्हिन" शब्द जैसे उनमें नव-वधु के जैसी ऊर्जा का संचार करता रहता है। अपनी बढ़ती उम्र का अहसास ही नहीं हो पाता उन्हें। माँ को इस कदर काम में जुटे देख कर कभी-कभी बच्चे भी दादी को छेड़ देते हैं-" दादी , अब तो पूजा पाठ में ध्यान लगाओ। कुछ दिनों में ही माँ की भी बहू आ जायेगी, तब भी तुम ऐसे ही 'दुल्हिन-दुल्हिन' करती रहोगी? अरे तुम्हारी बहू अब सास बनने वाली है, अब उनमें भी तो कुछ सास वाले गुन आने दो'

    लेकिन अम्मा पर कोई असर नहीं होता। उल्टे झिड़क देतीं-' अरे हटो रे....अपनी बहू को उसे जैसे रखना हो रखे, मुझे तो बहुएँ बहुओं की तरह ही अच्छीं लगतीं हैं। फिर तुम्हारी माँ बूढी हो गई है क्या? अभी उसकी उमर ही क्या है? फिर अभी तो मैं बैठी हूँ, उसकी बड़ी-बूढी। अभी खेलने-खाने दो उसे। बड़े आए सास बनाने वाले..........
    और अपनी माँ ' के खेलने-खाने ' की कल्पना मात्र से बच्चे हँसते-हँसते लोट-पोत हो जाते। फिर शुरू हो जाता अम्मा जी का बड़-बड़ाना जो देर तक चलता ।
    कितना मना करती हैं ममता जी ,लेकिन इन बच्चों को उन्हें छेड़ने में ही में आता है . अभी पिछले रविवार को ही बच्चों ने मन्दिर जाने का प्लान बनाया । मन्दिर जा रहे थे सो अम्मा को तो जाना ही था। बच्चों ने जिद पकड़ ली - अम्मा अपनी नई चप्पलें ही पहनना। नहीं तो जब भी मन्दिर जाती हो अपनी वही स्पेशल टूटी चप्पल निकालती हो।' अम्मा ने बहुत मना किया लेकिन बच्चों की, 'कोई मिल गया तो?' जैसी दलीलों के आगे अम्मा भी परास्त हो गईं। अपनी नई चप्पलें पहन के चल दीं। मन्दिर के अन्दर पहुंचाते ही भगवान् के ध्यान के स्थान पर चप्पलों की चिंता ने अपनी जगह बना ली। हर दो मिनट के अन्तराल पर -' कोई चप्पल न चुरा ले कहीं' का भजन अम्मा करतीं रहीं। मन्दिर से निकलने पर वही हुआ जिसका अम्मा को डर था। चप्पलें अपनी जगह पर नहीं थीं। किसी ने पार कर दीं थीं। अब क्या था! अम्मा लगीं ज़ोर-ज़ोर से चोर और उसके खानदान को कोसने! जैसे- तैसे उन्हें चुप कराया गया। नंगे पाँव चलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी, लेकिन किसी की भी चप्पल पहनने से उनहोंने इनकार कर दिया। मारे गुस्से के रिक्शे पर भी नहीं बैठीं। बच्चों ने बहुत समझाया, लेकिन बच्चों से ही तो नाराज़ थीं वे। जैसे-तैसे घर आया और गेट खोलने से पहले ही बच्चों की लानत-मलामत शुरू हो गई। जैसे चप्पलें नहीं कोई अनमोल खजाना चोरी हो गया हो।


    लेकिन ये क्या? घर के बरामदे में कदम पाँव रखा ही था, की अम्मा जी की चप्पलें उनका इंतज़ार करती मिलीं। अब तो पूरा मामला अम्मा जी और ममता जी दोनों को ही समझ में आ गया। और अब तक संजीदगी का अभिनय करते बच्चे लोट-पोत हो रहे थे और अम्मा जी कभी इसका तो कभी उसका कान पकड रहीं थीं।

    " दुलहिन...." सोच-विचार में डूबी ममता जी की तंद्रा अम्मा की आवाज़ से भंग हुई।

    "दुलहिन कल करवा-चौथ है, थोड़ा सा चावल तो भिगो दो लड्डू के लिए।" "ठीक है" कह ममता जी चल दीं।

    "दुलहिन....करवा वाली निकली है... खरीद तो लो"

    उफ़......उफ़......उफ़........

    कुछ काम अम्मा ख़ुद क्यों नहीं कर लेतीं? करवा वाली जा रही है, तो उसे रोक लें, खरीद लें। लेकिन नहीं। बाहर आराम कुर्सी पर बैठ कर "दुलहिन-दुलहिन " करना उन्हें ज़्यादा पसंद है। पता नहीं कब बड़ी हो पाएंगी ममता जी! लेकिन प्रत्यक्ष में हाथ का काम छोड़ कर बाहर पहुँच चुकीं थीं , ममता जी।

    सुबह से अम्मा जी की ताकीदें शुरू हो गईं थीं। अरे दुलहिन, ज़रा जल्दी से नहा-धो लेना। और देखो, प्यासी न रहना। नहा के दूध कॉफी जो पीना हो, पी लेना। न भूखा रहना है, न प्यासा। ममता जी को याद है, पच्चीस साल पहले जब ममता जी ब्याह के आईं थीं और उनकी पहली करवा-चौथ पड़ी थी, तो अम्मा जी ने अपने स्वभाव के विपरीत न केवल उन्हें पानी पीने को कहा बल्कि फलाहार भी जबरन ही करवाया।

    पिछले पच्चीस सालों से ये सिलसिला जारी है। कोई भी व्रत हो, अम्मा की ताकीदें शुरू हो जातीं हैं। और ममता जी सर झुकाए नई-नवेली दुल्हन की तरह आज्ञा का पालन करती जातीं। " दुलहिन भारी साड़ी पहनो, पायल पहनो......पूजा की तैयारी ऐसे करो...वो काम वैसे करो..." फिर आदेश , फिर झल्लाना, और फिर पालन। लगता था जैसे ये सिलसिला आजन्म चलता रहेगा। प्रकृति के साथ-साथ ।

    लेकिन ऐसा कभी हुआ है?

    ममता जी स्तब्ध हैं!! समझ ही नहीं पा रहीं की ये क्या हुआ!! अब वे क्या करें? हर पल आदेश देने वाली अम्मा जी चली गईं? लेकिन ऐसे कैसे जा सकतीं हैं? रात में तो अच्छी- भली थीं। खाना भी खाया था। लेकिन ऐसी कैसी सोयी की अब उठने को भी तैयार नहीं? किससे पूछें? क्या करें?

    कमरे में अम्मा जी का पार्थिव शरीर रखा है। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं। अम्मा जी को ले जाने की तैयारियां हो रहीं हैं। ममता जी अब भी बेखयाली में हैं। कोई क्या कह रहा है, उन्हें सुनाई ही नहीं दे रहा। उन के कानों में तो बस " दुलहिन-दुलहिन" की आवाजें आ रहीं हैं।

    अमा जी को ले गए हैं लोग। खाली घर, खाली दिल, खाली दिमाग और कान?? नहीं.......कान खाली नहीं हैं। ममता जी ने खूब ज़ोर से अपने कान बंद कर लिए हैं, कहीं "दुलहिन" शब्द बाहर न निकल जाए।

    अम्मा के जाते ही अचानक ही बहुत बड़ी हो गईं हैं ममता जी। उम्र के पचासों वर्ष जैसे घेर कर खड़े हो गए हैं उन्हें। बड़प्पन का यह अहसाह चाहा था उन्होंने? यकीनन नहीं।

    मंगलवार, 7 जुलाई 2009

    विलोम

    मुट्ठी भर दिन
    चुटकी भर रातें,
    गगन सी चिंताएँ,
    किसको बताएं?
    जागती सी रातें,
    दिन हुए उनींदे,
    समय का विलोम
    कैसे सुलझाएं?
    भागती सी सड़कें,
    खाली नहीं आसमान,
    दो घड़ी का सन्नाटा ,
    हम कहाँ से पायें?

    मंगलवार, 16 जून 2009

    ओढी हुई सभ्यता

    ’टन-टन-टन’ के साथ घड़ी ने पाँच बजने का संकेत दिया और ऑफिस में टेबिल-कुर्सी खिसकाने,फडफडाते कागजों को फाइलों में बंद करने की आवाजों ने ज़ोर पकड़ लिया। इक्के-दुक्के जूते-चप्पलों की आवाजें मेरे बगल से हो कर गुज़र गईं। प्रत्येक व्यक्ति घर जाने की जल्दी में है। लेकिन मैं? पाँच का घंटा सुनते ही मेरे हाथ-पाँव ढीले पड़ जाते हैं। शरीर जैसे बेजान हो जाता और मैं अपना सर कुर्सी पर टिका, रिलैक्स के मूड में आ जाती। रोज़ ही ऐसा होता है। मुझे घर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती। 'अनु, घर नहीं जाना क्या?' 'घर! आं.....हाँ जाना तो है , लेकिन सोचती हूँ एक फाइल और निपटा दूँ। बहुत काम है। 'पता नहीं मधु कब मेरे पास आकर खड़ी हो गई थी। 'छोड़ यार! ऐसे तो ये ऑफिस का काम निकलता ही चला आएगा। तू ज़्यादा ईमानदारी बरतती है न बस इसीलिए तीन-चार एक्स्ट्रा फाइल्स तेरे सर पर चढी रहती है। चल उठ न!''नहीं मधु, तुम जाओ। मैं आती हूँ। बस एक घंटे का काम और है।''क्या बात है, जल्दी ही प्रमोशन लेने के चक्कर में हो क्या? खैर जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।मैं तो चली।' मधु चली गई थी। कहती है, प्रमोशन के लिए इतनी मेहनत करती हूँ। .....बेचारी......... । उसकी समझ में तो मैं एक सुखी- संपन्न परिवार की लड़की हूँ न! लेकिन हमारी संपन्नता को, घरेलू स्थितियों को भला मधु कैसे समझ सकती है, तब जबकि उनके ऊपर हम लोगों ने बड़ी खूबसूरती के साथ रेशमी आवरण चढा रखा हो! हर रेशमी आवरण का अस्तर खुरदुरा होता है, ये भी तो सच है न! थोड़ा सा काम अभी बाकी था। पन्द्रह मिनट और लग जायेंगे। छः बज के पाँच मिनट हो रहे थे, यानि छः बीस तक काम निपट जाएगा, और पौने सात तक मैं घर पहुँच जाउंगी। 'बिटिया सबा छः हो गए' धनीराम था।' हाँ मालूम है ।' इतनी लापरवाही से दिए गए जवाब पर धनीराम खड़ा-खड़ा कभी मुझे कभी फाइलों के ढेर को देख रहा था। बेचारा! मेरे कारण रोज़ ही धनिराम को भी लेट होना पड़ता है। मुझे तो ओवर टाइम मिल जाता है, लेकिन धनीराम को मुफ्त में ही एक घंटा लेट होना पड़ता है। धनीराम को चुप देख कर बड़ा संतोष होता है। की चलो कोई तो है, जो मुझे पलट कर जवाब नहीं देता। छः बज के बीस मिनट हो गए थे . अब मुझे घर चलना चाहिए . घर ! हाँ , घर ही कहना होगा , क्योंकि वहां मेरे पापा हैं, एक अदद सौतेली माँ हैं, और उनके तीन बच्चे हैं, मेरा भी एक भाई है, यानि सगे भाई-बहन हम दो ही हैं। बाकी तीन मेरी दूसरी माँ के हैं। घर के नाम से ही शरीर में असंख्य कांटे से उगने लगते हैं। अजीब दहशत सी होती है, घर के नाम से। हर वक्त चख-चख, एक अजीब सा तनाव वातावरण में घूमता हुआ। सबके दिमाग तनावग्रस्त और चेहरे मुरझाये हुए। बस घर का मौसम कुछ यूँ है, की बादल गरजते और बिजली चमकती रहती है। देखना तो ये होता है, की ये बिजली कब किस पर गिरती है। और हमें न चाहते हुए भी इस बिजली की आग में झुलसना पड़ता है। रह जाता है हमारे पास एक झुलसा हुआ तन और दहकता हुआ मन। बस , इसीलिए घर जाने की इच्छा ही नही होती। लेकिन घर तो जाना ही है न! एक झटके के साथ फाइल्स बंद कर कुर्सी खिसका के मैं उठ गई। बाहर निकल कर मैं धनीराम को नहीं देख रही लेकिन धनीराम मुझे देख रहा है, यह मैं अच्छी तरह महसूस कर रही हूँ। एक दिन तो धनीराम ने टोक ही दिया था , बिटिया ऑफिस से सब पाँच बजे ही चले जाते हैं , तुम क्यों काम करती रहती हो ? और मैं बस मुस्कुरा दी थी . उससे क्या कहती ?मेरे स्टाप तक जाने वाली बस जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रही थी . अपने स्टाप पर उतरने के बाद मेरे पैर घर की ओर जाने से इनकार करने लगते हैं . और मैं उन्हें जबरन घसीटती हुई घर तक ले आती हूँ। रोज़ ही ऐसा होता है। घर के अन्दर से चिरपरिचित चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं। बबलू बाहर ही बैठा था। बात करने की गरज से पूछ लिया-'कॉलेज से आ गए?''नहीं। कॉलेज में ही हूँ।' बाप रे!!! ऐसा गुस्से भरा जवाब! समझते देर नहीं लगी की आज भी कुछ हो गया होगा। दबे पाँव अन्दर पहुँच पहुँची और धीरे से अपने कमरे में आ गई। 'नीलू, बड़ी मेम साब आ गईं हैं, उन्हें कमरे में ही चाय दे आ'- विष बुझी आवाज़ सुनाई दी। कमाल है! मैं इतनी छुपती-छुपाती दबे पाँव अपने कमरे में आई तब भी इनकी पैनी निगाहों से बच नहीं पाई। नीलू टेबिल पर चाय रख गई थी। 'साहबों जैसे ठाठ हैं। काम न धाम फ़िर भी कमरे में ही चाय चाहिए!! हम सब तो नौकर हैं। जैसा चाहा, नचा लिया! 'चाय ज़हर हो गई थी, मेरे लिए। मैंने कब कहा की मेरे लिए चाय तुम कमरे में पहुँचाओ? बल्कि मैं तो दबे पाँव इसीलिए आती हूँ , की कपडे बदल कर मैं ख़ुद चाय बना लूंगी। लेकिन बातें सुनाने के लिए चाय भी ख़ुद ही भिजवा देंगी और फिर उसी बात को तत्काल तमाम तानों के साथ सुना भी देंगीं। लो अब पियो चाय! एकदम आंसू ही आ गए मेरे तो। ओह माँ............तुम क्यों चलीं गईं? तुम समझतीं थी हम बड़े हो गए हैं, पापा भी बुढा रहे हैं तो दूसरी शादी नहीं करेंगे। लेकिन तुम ये क्यों भूल गईं , कि जिसके कारण तुमने आत्महत्या की, तुम्हारे जाने के बाद उसका रास्ता तो एकदम साफ़ हो गया न? फिर वो इस घर में क्यों न आती? और आई भी, अपने तीन बच्चों सहित। इनके आते ही हम, मैं और बबलू, दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। पापा तो अब कुछ बोल ही नहीं पाते। बस कभी-कभी रात गए मेरे कमरे में आते हैं, और मेरे पास आकर मेरे बालों को सहलाते हैं, कहते कुछ भी नहीं। बबलू ने तो जैसे अपने आप को बिल्कुल काट लिया है घर से। बस खाने और सोने का नाता ही रखा है उसने। मुझे भी उकसाता है-' तुम क्यों खटती रहती हो घर में? सुबह जितना खाना तुम बनाती हो क्या उतना हम दोनों ही खाते हैं? इस पूरी फौज का पेट भरने तुम क्यों चूल्हे में घुसी रहती हो? छोड़ दो सब काम। हम तुम होटल में खा लिया करेंगे। बनाएं देवी जी अपना, अपने पतिदेव और इस वानर सेना का भोजन। लेकिन मैं बबलू को कैसे समझाऊं! उसकी तरह फ्री स्टाइल मैं नहीं हो सकती। मज़े की बात तो ये है की सुबह का सारा काम निपटाने दोनों छोटे बच्चों को स्कूल भेजने के बाद भी मुझे सुनना पड़ता है की काम नहीं करती। 'अरे दीदी! आपने चाय नहीं पी?''ओह!! मैं भूल ही गई। ' और उस काढा हुई चाय को होठों से लगा लिया मैंने। 'कुलच्छनी है। चाय के लिए नखरे बता रही है। और घरों में देखा नहीं है, की कैसे लड़कियां काम में खटतीं हैं. काम करना पडे तो आटे दाल का भाव मालूम हो.’ मैं सोचती हूं कि काम भी मैं करती हूं और शायद इसीलिये आटे-दाल का भाव भी मुझे मालूम है. लेकिन इससे क्या? अच्छा ही हुआ जो मैं नौकरी करने लगी. वरना अब तक तो इस गाली-गलौज के कारण मैं भी नींद की गोलियां खा कर सो गई होती, मम्मी की तरह. ’पडी-पडी खाना चाहती है. पता नहीं कब तक मेरी छाती पर मूंग दलती रहेगी. भगवान इसका काला मुंह भी तो नहीं करता. ’ काला मुंह! सबके हाथ पीले होते हैं, मेरा मुं ह काला होने वाला है क्या? हे भगवान! ये दिन भर गालियों के साथ बात करने वाली मम्मी एम.ए. बी.एड हैं कोई मानेगा क्या? मेरी मां और इनमें कितना फ़र्क है! तब सचमुच ही हमारा घर आदर्श हुआ करता था. हम लोग सचमुच ही सभी-सुसंस्कृत थे। लेकिन अब? अब सभ्यता का झूठा आवरण ओढ़ना पड़ता है। सबसे चेहरे पर नकली मुस्कुराहट चिपका कर बात करनी पडती है। वरना हंसने-मुस्कुराने जैसे शब्द तो हमारे शब्दकोष से गायब ही हो गये हैं। मम्मी को गये तीन साल हो गये, और इस बीच हम लोगों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया हो, ऐसा मुझे याद नहीं पडता।आज रविवार है . यानि छुट्टी का दिन । सबका प्यारा दिन, लेकिन यही रविवार जो कभी मुझे बेहद प्रिय था, आज काटने को दौडता है. लगता है, कहां भाग जाऊं! लेकिन कहीं भाग भी तो नहीं सकती. ’अनु तुम्हारी सहेली आई है.’ बबलू की आवाज़ थी. जाकर देखा, मधु थी. अच्छा लगा. हम लोग बातें कर रहे थे, लेकिन मैं दर रही थी, कि पता नहीं कब गालियों की खूबसूरत आवाज़ें मेरे कमरे में सुनाई पडने लगें. मधु शायद मेरे चेहरे से परेशानी पढ पा रही थी, समझ रही थी, कि मैं शायद किसी बात पर अनमनी हूं. और उसने पूछ ही लियी-’अनु जब से मैने तुम्हें जाना, तभी से तुम मुझे बेहद गुमसुम सी लगीं. एकदम चुपचाप. न हंसना, न बोलना. मैं ही हूं, जितना बोलती हूं तुम तो बस उतने का जवाब भर दे देती हो. घर का कोई कारण है, या या कोई दूसरी.....’’नहीं-नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे घर के सभी लोग बहुत अच्छे हैं. तुम नहीं जानतीं मधु, मेरी मम्मी दूसरी ज़रूर हैं पर मुझे कितना प्यार करतीं हैं. बहुत अच्छी हैं मेरी मम्मी.’मेरी आवाज़ रुंध गई थी. कितना बडा झूठ मैं बोल रही थी, अपने घर की पुरानी मर्यादा को बनाये रखने के लिये.



    बुधवार, 10 जून 2009

    सीमाबद्ध

    'अरे...........क्या कर रहे हो?' जब तक मैं कुछ समझूं, तब तक सुनील मुझे एक प्यारी सी साडी में लपेट चुके थे। और मैं भी अवश, मंत्रमुग्ध सी उसमें लिपटती जा रही थी।
    'अब कुछ समझ में आया की मैं क्या कर रहा था?'
    'आया जनाब , लेकिन अपने स्वेटर पर तो रहम किया होता, सारे फंदे निकल गए...'
    आज हमारी शादी की सालगिरह थी। दस साल हो गए, लेकिन सुनील इस दिन को सेलिब्रेट करना नहीं भूलते। जब से मैं इस घर में आई हूँ, तब से सुनील और उनके घर वालों ने मुझे अपने प्यार-स्नेह से सराबोर कर दिया है। कभी-कभी तो इतना अधिक प्यार असह्य हो जाता है, मेरे लिए। इतने प्यार-दुलार की आदि नहीं हूँ न! पाँच बरस की थी जब मेरी माँ का देहांत हुआ । अपनी कर्कशा चाची के पास ही रही। पापा ने मेरे कारण दूसरी शादी नहीं की अपने माँ-पापा की दुलारी इकलौती बेटी जो थी। उन्हें डर था, की दूसरी माँ पता नहीं मुझे प्यार दे पाएगी या नहीं? लेकिन पापा ने जिस डर से शादी नहीं की, उससे मुझे बचा पाये?
    मुझे अच्छी तरह याद है, मैं आठ बरस की थी तब। रक्षा बंधन का दिन था। अपनी चचेरी बहनों नीलू-शीलू दी के साथ ही मैंने भी मेंहदी लगाई थी। सुबह सबकी हथेलियाँ मेंहदी से लाल हो रही थीं। दोनों दीदियाँ तो अपने हाथों तक पानी पहुँचने ही नहीं देना चाहती थीं। उनकी देखा-देखी मैंने भी पानी से बचने की सोच ली। अपनी छोटी-छोटी रची हुई हथेलियों को देख कर मैं फूली न समा रही थी। तभी चाची की आवाज़ आई-
    'रीतू, चल ये कप धो दे ज़रा। सब को चाय दे दूँ। '
    मैंने निरीह भाव से नीलू दीदी को देखा तो 'जा न..कप धो दे ।' कह कर उनहोंने मुझे झिड़क दिया। आंसू आ गए मेरे लेकिन आंसुओं को ज़ज्ब करना तो बहुत बचपन में ही सीख लिया था मैंने। शायद मेरा नन्हा मन समझ गया था की यहाँ मेरे आंसुओं की कोई कीमत नहीं।
    नहा-धो कर नीलू-शीलू दी और राजू ने नए कपडे पहने थे और मैंने अपनी पुरानी फ्राक जो पापा दीवाली में लाये थे, अपने नन्हें हाथों से धोकर जिसे मैंने रात में ही तकिये के नीचे रख लिया था, पहन ली। राखी पर मेरे कपडों के लिए पापा ने पैसे भेजे थे मुझे मालूम था, लेकिन उससे क्या? उन पैसों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम जानने लायक उम्र भी नहीं थी। मेरे बड़े होने पर पापा ने बताया था की वे मेरे सभी खर्चों -कपडों के लिए नियमित पैसा भेजते थे, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता की चाची ने मेरे लिए कभी कोई कपडा ख़रीदा हो। जब पापा आते थे तो वही ज़रूरत की तमाम चीज़ें खरीद देते थे। उनमें से भी मुझे क्या मिलता था?
    दोनों दीदियाँ घंटों मुझसे झूला झुलावाया करतीं थीं, और मैं भी बस इस इच्छा से की बाद में मुझे भी पाँच चक्कर झूलने को मिलेंगे, खूब तेज़ झूला झुलाती थी। लेकिन वो पांच चक्कर मुझे कभी नहीं मिलते थे। एक बार पापा ने मुझे ले जाने की बात की थी लेकिन तब चाची ने जबरन रोक लिया था, उनकी स्थाई नौकरानी न चली जाए इस डर से। मैं भी चाह कर भी जाने की बात नहीं कह पाई थी। कुछ बोलने का कभी मुझे मौका ही नहीं मिला। और शायद इसीलिये मेरे शब्द मुझसे रूठ गए थे। अब मैं चाह कर भी अपनी बात किसी को समझा ही नहीं पाती।
    दिन हो या रात ज़रूरत पड़ने पर मुझे ही बुलाया जाता था। ज़रा सा काम बिगडा नहीं की चाची के ज़ोरदार थप्पड़ चेहरा लाल कर देते थे। अपनी माँ की दुलारी छुईमुई सी मैं, चाची के डर से काम और भी ज़्यादा बिगडते,मार और ज़्यादा पडती। इसी तरह डांट, फटकार,मार और झिड़कियों के बीच बचपन बीता मेरा। कालेज में आ गई थी मैं । उन्ही दिनों नीलू दी की शादी हो गई थी और शीलू दी के लिए जोर -शोर से लड़का ढूँढा जा रहा था . लेकिन कहीं भी बात तय नहीं हो पा रही थी . जो दो चार लडके शीलू दी को देखने आये थे, वे मुझे पसंद कर गये। इन बातों से शीलू दी मुझसे और अधिक चिढने लगीं थीं। चाची का सारा गुस्सा भी मुझ पर ही निकलता था। लेकिन अब मेर युवा होता मन विद्रोह करना चाहता था। लेकिन विद्रोह करके जाती कहां? पापा तो इतने तटस्थ हो गये थे कि मुझे महसूस ही नहीं होता था कि वे मेरे पापा हैं। हर महीने पैसे भेज कर ही उनहोंने अपने दायित्व की इतिश्री कर ली थी।
    उन्हीं दिनों सुनील के यहां शीलू दी की शादी की बात चली थी। और हर बार की तरह इस बार भी जब सुनील पैवार सहित शीलू दी को देखने आये तो मुझे पसन्द कर चले गये। लेकिन इस बार सुनील पिछले लडकों की तरह चाचा के मना करने पर मान नहीं गये वरन ज़िद ही कर ली मुझे ब्याहने की। पापा को भी सुनील पसंद आये और फ़िर आनन-फ़ानन मेरा ब्याह हो गया। शायद पापा को भी जल्दी थी, मुझे उस घर से निकालने की।
    बस इस तरह मैं सुनील की ज़िन्दगी में आ गई और तब से ही सुनील ने पलकों पर बिठाया है मुझे। हर दुख-दर्द को बराबरी के साथ महसूस किया है उन्होंने।
    ’अरे!! देवी जी अभी तक यहीं विराजमान हैं?’ बुरी तरह चौंक गई थी सुनील की आवाज़ पर।
    ’रीतू, हमारी शादी को दस साल हो गये लेकिन तुम्हारी ये चौंकने-सहम जाने की आदत अभी तक गई नहीं। तुम्हारे इस तरह सहम जाने से मुझे बहुत दुख होता है। तुम ये क्यों भूल जाती हो कि तुम अब उस कारागार में नहीं अपने घर में हो। जो कि पूरी तरह तुम पर आश्रित है। इस घर का प्रत्येक सदस्य तुम्हारा मुंह जोहता है, तुम किसी की मोहताज नहीं हो। तुम्हें इस तरह सिमटते देख कर लगता है, कि मेरे प्यार में ही कोई कमी है जो तुम अभी तक अपने भीतर समाये भय को बाहर नहीं निकाल पाईं।’
    मैं तुम्हें कैसे समझाऊं सुनील कि जिसे शैशव से लेकर युवावस्था तक केवल मार-डांट ही मिली हो कडी से कडी सज़ा ही जिसके हिस्से में आई हो, उसके मन से भय इतनी आसानी से कैसे निकल सकता है? पहले सबकी डांट से सहमी रहती थी, अब तुम्हारे अत्यधिक प्यार से सहमी रहते हूं। प्लीज़ सुनील, मुझे इतना अधिक प्यार मत दो कि मैं उसे बर्दाश्त ही न कर पाऊं। मुझे सीमाबद्ध प्यार चाहिये, दे पाओगे सुनील?
    मेरी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह चली थी, जिसे सुनील कुछ समझे, कुछ नहीं।

    सोमवार, 1 जून 2009

    मेरी पसंद के खजाने से...

    टूटते लम्हों को मुट्ठी में जकड़ने वालो,
    क्या मिलेगा तुम्हें,परछाईं से लड़ने वालो।
    उम्र भर बैठ कर रोना कोई आसान नहीं,
    अपनी यादें भी लिए जाओ,बिछड़ने वालो.

    गुरुवार, 21 मई 2009

    अज्ञात

    यादों की नागफनी सी चुभती रात,
    होंठों पर पथराती अंतस की बात।
    सब कुछ विष बोरा सा ,सब कुछ बदरंग,
    ख़त्म नहीं होता है , दर्द का प्रसंग।
    ( यह रचना भी बुद्धिनाथ मिश्र की है, जो याद रहती है.)

    रविवार, 10 मई 2009

    "ऐसी होती है माँ"

    तेरे दामन में सितारे हैं, तो होंगे ऐ फलक,
    मुझको अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी।

    लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती,
    बस एक माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती।

    ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
    मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सज़दे में रहती है।

    ( माँ के लिए कही गई मुन्नवर राना की इन पंक्तियों से बेहतर मुझे कोई और रचना नही लगती)

    रविवार, 3 मई 2009

    अनिश्चितता में...


    ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे की तरफ़ चल पड़ा। रिज़र्वेशन तो था नहीं सो जनरल डिब्बे में ही घुसना था, सो घुस गया. खड़े होने लायक जगह मिल गई थी। प्लेटफार्म पर अब वे ही लोग रह गए थे जो अपने मित्रों, या रिश्तेदारों को छोड़ने आए थे ,और अब ट्रेन के चलते ही हाथ हिलाने लगे थे। इस डिब्बे में केवल मैं ही ऐसा व्यक्ति था, जिसे कोई छोड़ने नहीं आया था। ऐसा नहीं है की मेरे घर में कोई है ही नहीं मां-पापा,दो भाई सब हैं,लेकिन इन सब के होते हुए भी मैं कितना अकेला हो गया हूँ। इसी अकेलेपन से बचने, पता नहीं कहाँ जा रहा हूँ मैं............
    'भाई साहब आप चाहें तो यहाँ बैठ जाएँ, मैं अगले स्टेशन पर ही उतारूंगा...' कोई छोटा सा स्टेशन आने वाला था पहली बार मेरी किस्मत ने साथ दिया था। ऐसी ठसाठस भरी ट्रेन में जगह मिल गई थी। आराम से बैठ कर एक मैगजीन के पन्ने पलटने लगा था। ट्रेन पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। मेरा घर , मेरा शहर बहुत पीछे छूट गया था।
    पिछले कुछ महीनों में घर के माहौल में जो परिवर्तन आया था, वह निश्चित रूप से दुखदायी थायह परिवर्तन भी तो अचानक ही आया था। और इसकी तह में राजू, मेरे छोटे भाई की नौकरी लग जाना थाराजू की बी.ई.की डिग्री रंग लाई थी, उसका सेलेक्शन शहर के ही एक प्रतिष्ठित संस्थान में हो गया थाराजू मुझसे दो साल छोटा हैपढने में तेज़ है, इसमें कोई शक नहीं , लेकिन मैं भी तो एम्.एस.सी करके बैठा हूँ, वो भी ७५% लाकरये अलग बात है, की अब इस तरह की डिग्रियों से कुछ होता नहींशायद इसीलिए पिछले दो सालों से बेकार बैठा हूँलगातार कई प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहता हूँ,लेकिन हासिल क्या होता है?मैं ख़ुद से परेशान हूँराजू को छः महीने की ट्रेनिंग पर बाहर जाना था बस उसके जाते ही घर के माहौल में जिस तेज़ी के साथ परिवर्तन हुआ, उसे देखते, मह्सूते हुए घर में रह पाना बड़ा मुश्किल था, मेरे लिएअभी भी नौकरी का कोई ठीक-ठिकाना होते हुए भी मैं लखजा रहा हूँ, अपने एक दोस्त के पास , जिसने अपने ऑफिस में कोई काम की बात कर के रखी हैकुछ भी मिलेगा, कम से कम अपने आवेदन पत्र तो ख़ुद के पैसों से खरीद सकूंगा

    अभी एक महीने पहले तो पापा ने साफ़-साफ़ कह दिया था। उस दिन पापा बड़े गुस्से में थेकारण, बैंक का रिज़ल्ट गया था, और में उस में भी नहीं निकल सका थादुनिया भर के सफल लड़कों के उदाहरण दे-दे कर डांटते रहे कितनी बातें सुनाईगुस्से में उनके मुंह से निकल ही गया, "आख़िर कब तक खिलाऊंगा तुम लोगों को?" लोगों को? लोग अब थे ही कहाँ? राजू की नौकरी लग गई थी , छोटा भाई अभी पढ़ रहा थायानि पापा अब सिर्फ़ मुझे ही खिलने में असमर्थ थे? मैं ही घर के लिए बोझ बन रहा थाउसी दिन मैंने सोच लिया था की अब पापा से पैसे नहीं मांगूगा कभीऔर पड़ोस के एक लड़के को ट्यूशन पढ़ने लगा थामहीने के अंत में पाँच सौ रु.मिल गए थे मुझे

    वे मेरी भागदौड के प्रारम्भिक दिन थे जब मैं सोचता था की नौकरी लगते ही मैं राजू को एम्..ज़रूर करवाऊंगा, लेकिन मैं सोचता ही रह गया और राजू की नौकरी भी लग गईएक दिन मुझे उदास देख कर राजू ने कहा था , की "भइया, आप अपने बैंक ड्राफ्ट के लिए हमेशा चिंता करते रहते हो , बस छः महीने बाद मेरी पोस्टिंग हो जायेगी तब फ़िर तुम आराम से कितने भी आवेदन करते रहना.....पैसों की कोई चिंता नहीं..." मैं राजू का चेहरा देखता रह गयाहांलांकि उसने एकदम सरलता से ही ये कहा था, लेकिन मुझे लगा की कहाँ मैं इसे एम्..करवाने की बात करता था और अब यही मुझे आवेदन-पत्रों के लिए पैसे देगा!! यानी राजू को पूरा भरोसा था, की इन छः महीनों में उसके भइया की नौकरी कहीं भी नहीं लगने वालीऔर अब जब राजू तीन दिन बाद घर लौट रहा है, मैं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ,की उसके आते ही घर के सारे सदस्य मेरी उपेक्षा करते हुए जताएंगे की मैं बेरोजगार हूँनिश्चित रूप से मैं इस उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर सकतावैसे भी मैं राजू के सामने जाने में अजीब शर्म सी महसूस कर रहा था

    ट्रेन लखस्टेशन पर आकर लग गई थीनीचे खड़े लोग तेज़ी से ऊपर आना चाह रहे थे , और अन्दर से उतरने वाले उन्हें धकियाते, झिडकते नीचे उतर रहे थेजल्दी से जल्दी स्टेशन से बाहर निकल घर पहुँचने को सबके बेताब कदमलेकिन मुझे कहीं जाने की जल्दी नहीं है

    ट्रेन ने सरकते-सरकते फ़िर गति पकड़ ली है, और प्लेटफार्म छोड़ अपने गंतव्य को बढ़ गई है, लेकिन मैं अभी तक प्लेटफार्म पकड़े हूँ, क्योंकि मुझे तो अपना गंतव्य भी ज्ञात नहीं